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विश्‍व पर्यटन का केन्‍द्र बनने की ओर अग्रसर भारत

‘‘एक ऐसी जगह जिसे सभी लोग देखना चाहते हैं और एक बार इसके दर्शन कर लेने के बाद, भले ही उन्‍होंने इसकी केवल झलक भर देखी हो, दुनिया की तमाम छवियों को इस एक झलक पर न्‍योछावर करने को तैयार हों’’—ये पंक्तियां हैं मार्क ट्वेन की जो उन्‍होंने भारत के बारे में लिखी थीं।

‘अतुल्‍य भारत’ वाक्‍यांश से मन में अनेक अनोखे चित्र उभरते हैं जिनमें उत्‍तर में हिमालय की हिम मंडित चोटियों से लेकर पश्चिम में फैला विशाल मरुस्‍थल, पूर्व की अनोखी वनस्‍पतियां, गर्म जलवायु के वर्षावन, मनोहर झीलें, रमणीक समुद्र तट और दक्षिण में मानसून की वर्षा की फुहारें शामिल हैं। इसके अलावा भी यहां बहुत कुछ है जैसे यहां के अनेक ऐतिहासिक, सांस्‍कृतिक और धरोहर स्‍थल जो देश की उस विविधता को प्रदर्शित करते हैं जो सदियों पुरानी है।

दुनियाभर के पर्यटक भारत आकर भांति-भांति के जो अनुभव हासिल करते हैं वही इसे स्‍वर्ग के समान और ‘अतुल्‍य’ बनाते हैं। यह एक ऐसा स्‍वर्ग है जहां आने की चाहत वे बार-बार अपने मन में करते हैं। जहां दुनिया के अनेक देशों में पर्यटकों को छुट्टियां मनाते हुए सिर्फ एक तरह का अनुभव प्राप्‍त होता है, वहीं भारत में उन्‍हें जलवायु, भूगोल, संस्‍कृति, कला, साहित्‍य, जातीयता और खान-पान संबंधी विविध अनुभव हासिल होते हैं।

भारत आने वाले विदेशी पर्यटकों की संख्‍या और उससे सरकार के राजस्‍व तथा विदेशी मुद्रा की आय में बढ़ोतरी इसका स्‍पष्‍ट प्रमाण हैं।

भारत में पर्यटन का विकास

भारत सदियों से विदेशी यात्रियों, पर्यटकों और व्‍यापारियों के आकर्षण का केन्‍द्र रहा है। दुनिया के अन्‍य देशों, सभ्‍यताओं और लोगों के साथ भारतीय उप-महाद्वीप का निरंतर संपर्क हमारी सांस्‍कृतिक विविधता में स्‍पष्‍ट रूप से परिलक्षित होता है जिसे हमारी भाषाओं, रीति-रिवाजों, त्‍योहार व उत्‍सवों, संगीत, नृत्‍य और कलाओं आदि में देखा जा सकता है। लेकिन यह भी एक तथ्‍य है कि आजादी के बाद के शुरुआती वर्षों में पर्यटन क्षेत्र पर ज्‍यादा ध्‍यान नहीं दिया गया क्‍योंकि उस समय कोई यह कल्‍पना भी नहीं कर सकता था कि यह बड़े पैमाने पर आमदनी उपलब्‍ध कराने वाला उद्योग साबित हो सकता है।

भारतीय पर्यटन के क्षेत्र की महत्‍वपूर्ण घटनाओं में से एक वर्ष 1966 में भारतीय पर्यटन विकास निगम (आईटीडीसी) का गठन था। इसका मूल्‍य उद्देश्‍य देश में पर्यटन के बुनियादी ढांचे और सेवाओं का विकास करना था। इसी तरह के संगठन राज्‍यों में भी बनाए गए।

पर्यटन क्षेत्र की गतिविधियों और नीतिगत पहलों ने 1980 के दशक के बाद सही मायने में गति पकड़ी। 1982 में, यानी देश की आजादी के 35 साल बाद भारत में पहली बार पर्यटन के बारे में राष्‍ट्रीय नीति की घोषणा की गयी। इसी वर्ष भारत में एशियाई खेलों की मेजबानी करने की योजना भी बनी थी जिसके तहत विदेश से बड़ी संख्या में लोगों के आगमन की संभावनाओं को ध्‍यान में रखते हुए विदेशी मेहमानों के रहने, ठहरने और मनोरंजन की सुविधाओं को केन्‍द्र बनाकर देश में पर्यटन पर जबरदस्‍त चर्चा भी छिड़ी। पर्यटन के बारे में आम दिलचस्‍पी और बहस से ही पहली राष्‍ट्रीय पर्यटन नीति का जन्‍म हुआ जिसके तहत इस क्षेत्र के विकास के लिए एक कार्य योजना तैयार की गई।

इसके बाद के दशकों में भारत की वैश्विक छवि में बदलाव आया और भारत झुग्‍गी-झोंपड़ियों वाले और गरीबी से ग्रस्‍त देश की बजाय विकासशील देश और उसके बाद उभरती हुई आर्थिक महाशक्ति के रूप में सामने आने लगा। इससे बाद के दशकों में भारत आने वाले विदेशी पर्यटकों की संख्‍या में लगातार तेजी से बढ़ी।

एनडीए सरकार के पहले कार्यकाल के दौरान 2002 में सरकार ने नई पर्यटन नीति तैयार की जिसका उद्देश्‍य था पर्यटन को देश के आर्थिक विकास के प्रमुख कारक के रूप में प्रतिष्ठित करना और रोजगार तथा गरीबी उन्‍मूलन में इसके प्रत्‍यक्ष और अप्रत्‍यक्ष प्रभावों का इस तरह से फायदा उठाना जिससे कि पर्यावरण पर भी इसका प्रतिकूल असर न पड़ने पाए।

अतुल्‍य भारत

‘अतुल्‍य भारत’ की आत्‍मा, विविधता में एकता में अंतर्निहित है। भारत, यहां आने वाले पर्यटकों को भांति-भांति के अनुभव एकमुश्‍त उपलब्‍ध कराता है। देश का प्रत्‍येक क्षेत्र सैलानियों को अपने तरह का अनोखा अनुभव देता है जो शेष भारत से एकदम अलग होता है।

देश के उत्‍तरी भाग में पर्यटक बर्फ से ढकी चोटियों और वादियों के बीच पर्वतीय क्षेत्र का आनंद उठा सकते हैं तो दक्षिण में सागर का अनंत विस्‍तार उन्‍हें खूबसूरत तटों, झीलों और नदियों के मनोरम दृश्‍यों की जो झलक दिखाता है उसका अनुभव एकदम अलग होता है।

अंडमान-निकोबार द्वीप समूह या लक्षद्वीप में समुद्री जीवों और शांत द्वीपों की पवित्र सुंदरता के दर्शन होते हैं। दुनिया के सबसे बड़े धार्मिक समागम - कुंभ मेले में भाग लेकर पर्यटक भारत की सदियों पुरानी धार्मिक परम्‍परा का हिस्‍सा बन सकते हैं।

देश के विभिन्‍न भागों में आयोजित किए जाने वाले वार्षिक साहित्‍योत्‍सव देश की कला और साहित्‍य की समृद्ध परम्‍परा की स्‍पष्‍ट झांकी प्रस्‍तुत करते हैं।

इस तरह भारत के अनोखे गंतव्‍य स्‍थल, यहां के ग्रामीण अंचल, रंगारंग उत्‍सव, रं‍गबिरंगी पोशाकें, पारंपरिक पकवान और विभिन्‍न आस्‍था वाले लोगों का आपस में मिलजुल कर रहना एक ऐसा आकर्षण है जो छुट्टियां बिताने के लिए विदेश यात्राएं करने वाले पर्यटकों के लिए भारत को एक बेमिसाल जगह बना देता है।

नई नीतियां और कार्यक्रम

भारत की विविधता, यहां के कम खर्चीले पर्यटन स्‍थानों, गंतव्‍य स्‍थलों की विशिष्‍ट ब्रांड छवियों और बढ़ते निजी व विदेशी निवेश ने भी अन्‍य देशों से भारत में पर्यटकों के आवागमन को बढ़ावा देने में अपना योगदान किया है।

देश में पर्यटन की संभावनाओं के विस्‍तार और इसमें विविधता लाने तथा इसे साल के सभी दिनों पर्यटकों के आकर्षण का केन्‍द्र बनाए रखने के लिए ‘नीश टूरिज्‍म प्रोडक्‍ट्स‘ यानी खास तरह के पर्यटकों के लिए खास तरह की सुविधाओं की शुरुआत से भी विदेशी पर्यटकों की संख्‍या में इजाफा हुआ है। इस तरह के नीश प्रोडक्‍ट्स (विशिष्‍ट पर्यटक सुविधाओं) में वन्‍यजीव एवं पारिस्थितिकीय पर्यटन; बैठक, प्रोत्‍साहन, सम्‍मेलन और कार्यक्रमों के आयोजन के लिए पर्यटन, टिकाऊ पर्यटन, गोल्‍फ पर्यटन, पोलो पर्यटन, चिकित्‍सा पर्यटन और स्‍वास्‍थ्‍य पर्यटन आदि शामिल हैं।

इधर, वीजा ऑन अराइवल (विदेशियों के स्‍वदेश आगमन के बाद उन्‍हें वीजा देने) सुविधा और ई-टूरिज्‍म वीजा सुविधा प्रारंभ किये जाने से भी भारत आने वाले विदेशी पर्यटकों की संख्‍या बढ़ी है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार मई 2017 में भारत आए विदेशी पर्यटकों की संख्‍या 6.30 लाख तक पहुंच चुकी थी जबकि मई 2016 में यह 5.27 लाख और मई 2015 में 5.09 लाख थी। जनवरी से मई 2017 के दौरान भारत को पर्यटन से 74,008 करोड़ रुपये की आमदनी हुई जो 19.2 प्रतिशत की बढ़ोतरी को दर्शाता है।

सरकार अध्‍यात्मिक पर्यटन और तीर्थ पर्यटन को बढ़ावा देने पर विशेष रूप से ध्‍यान दे रही है। इससे भी  पर्यटन क्षेत्र की क्षमता का और अधिक उपयोग हो सकेगा और भारत आने वाले विदेशी पर्यटकों की संख्‍या में बढ़ोतरी होगी। पर्यटन की संभावनाओं वाले सर्किटों के योजनाबद्ध और प्राथमिकता के आधार पर विकास के लिए सरकार ने ‘स्‍वदेश दर्शन’ नाम की योजना शुरू की है। इसका उद्देश्‍य लोगों में संस्‍कृति और विरासत के महत्‍व के बारे में जागरूकता पैदा करने के लिए देश में पर्यटन को बढ़ावा देना है।

विश्‍व की आर्थिक महाशक्ति बनने की दिशा में अग्रसर भारत के बढ़ते महत्‍व को ध्‍यान में रखते हुए यह उम्‍मीद की जा सकती है कि आने वाले वर्षों में यहां आने वाले विदेशी पर्यटकों की संख्‍या में उत्तरोत्‍तर वृद्धि होगी।

(लेखक पत्रकार हैं। इस लेख में व्‍यक्‍त विचार उनके निजी विचार हैं।)

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