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आपके बच्चे को बहरा न बना दे गर्भावस्था में ली गई एंटीबायटिक…

आपके बच्चे को बहरा न बना दे गर्भावस्था में ली गई एंटीबायटिक…

आगरा : गर्भावस्था के दौरान डॉक्टर के परामर्श के बिना कोई दवा न लें क्योंकि इसका असर आपके गर्भस्थ शिशु पर पड़ सकता है। यहां तक कि डॉक्टर की सलाह के बिना ली गई एंटीबायटिक दवाएं आपके गर्भस्थ शिशु की सुनने की क्षमता भी समाप्त कर सकती हैं। चिकित्सा तकनीक के ऐसे विकसित दौर में जब गर्भ में ही बच्चे के सुनने की क्षमता का पता लगाया जा सकता है, तब मामूली सी लापरवाही बच्चों के बहरेपन के प्रतिशत को बढ़ाने में उत्प्रेरक का काम कर रही है।

यह जानकारी रेनबो हॉस्पीटल में आयोजित ईएनटी और स्त्री रोग विशेषज्ञों के साइंटीफिक सेशन में डॉ. नरेन्द्र मल्होत्रा ने दी। उन्होंने बताया कि हजार में से लगभग तीन बच्चों में बहरेपन की समस्या होती है। वहीं 3-4 प्रतिशत बच्चों में जन्म से ही बहरेपन की समस्या होती है। जाहिर है, जो बच्चे सुन नहीं पाते वे बोल भी नहीं सकते हैं। डॉ. मल्होत्रा ने बताया कि जितनी जल्दी समस्या का पता चलेगा उतनी ही अधिक सम्भावना इसके निदान की होती है।

चौबीस हफ्ते में गर्भस्थ शिशु में सुनने की क्षमता विकसित हो जाती है। उस वक्त वीएसटी विधि से बच्चे के सुनने की क्षमता को जांचा जा सकता है। जिन लोगों में यह समस्या वंशानुगत हो उन्हें इसकी जांच अवश्य करानी चाहिए। कई बार गर्भावस्था के दौरान महिला को इन्फेक्शन होने या शिशु के 48 घंटे से अधिक समय तक आईसीयू में रहने (हैवी एंटीबायटिक चलने पर) भी न सुनने की समस्या हो सकती है।

ईएनटी विशेषज्ञ डॉ. रजत कपूर ने समस्या से निजात पाने के चिकित्सकीय पहलू पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि लम्बे समय तक जुकाम रहने या फिर बिना परामर्श के एंटीबॉयटिक दवाएं लेने पर भी सुनने की शक्ति पर प्रभाव पड़ता है। ऑडियोलॉजिस्ट मीनाक्षी ने स्पीच व हेयरिंग पर अपना व्याख्यान दिया। इस मौके पर डॉ. निहारिका, डॉ. निशा यादव, डॉ. वंदना कालरा, डॉ. राजीव लोचन शर्मा सहित 100 से अधिक डॉक्टर मौजूद थे। 

सावधानियां

-गर्भावस्था के दौरान एंटीबायटिक न लें।

-यदि शिशु 48 घंटे से अधिक समय तक ईसीयू में रहा है तो उसमें सुनने की क्षमता की जांच अवश्य कराएं।

-गर्भवती महिलाएं अपने खान-पान का ख्याल रखें क्योंकि कम वजन व प्रि-मैच्योर बेबी में भी इस तरह की समस्या अधिक देखने को मिलती हैं।

-बेवजह और बिना परामर्श के एंटीबायटिक न लें। इसका असर सुनने की क्षमता पर भी पड़ सकता है।

-कान में मैल निकालने के लिए कई लोग माचिस की तीली आदि का प्रयोग करते हैं। असल में कान में मैल नहीं, वैक्स होता है जो जरूरत पड़ने पर खुद व खुद निकल जाता है। यदि तीली आदि से निकालने पर वैक्स परदे पर चिपक जाए तो भी सुनने की क्षमता खत्म हो सकती है। 

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