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भारत को कृमिमुक्‍त बनाने के लिए नई डी-वॉर्मिंग योजना की शुरुआत

स्‍वास्‍थ्‍य एवं परिवार कल्‍याण मंत्रालय ने 9 फरवरी को जयपुर में राष्‍ट्रीय डी-वॉर्मिंग पहल की शुरुआत की। (Read in English: New De-worming Initiative Launched To Make India Worm Free)

डी-वॉर्मिंग

इसके तहत मानव और पशुओं को राउंड वॉर्म, हुक वॉर्म, फ्लूक और टेप वॉर्म जैसे परजीवी कृमियों से बचाने के लिए एंटी हेलमिंटिक दवा दी जाती है। स्‍कूली बच्‍चों के सामूहिक डी-वॉर्मिंग अभियान के तहत हेलमिनथिएसिस की रोकथाम और उपचार के लिए इस दवा का इस्‍तेमाल किया जाता है। इसमें मिट्टी के संपर्क से पैदा होने वाला हेलमिनथिएसिस भी शामिल है। बच्‍चों का उपचार मेबेनडेजॉल और एलबेनडेजॉल से किया जा सकता है। एलबेनडेजॉल की एक गोली से बच्‍चों को परजीवी कृमियों से बचाया जा सकता है, जो बच्‍चे की आंतों में रहते हैं और मानसिक स्‍वास्‍थ्‍य तथा शारीरिक विकास के लिए आवश्‍यक पोषण तत्‍वों को अपना आहार बनाते हैं। यह गोली संक्रमित और गैर संक्रमित बच्‍चों के लिए सुरक्षित है तथा इसका स्‍वाद बहुत अच्‍छा है।

हेलमिंथ्‍स

यह परजीवियों का एक समूह है जिन्‍हें कृमि के रूप में जाना जाता है। इनमें सिस्‍टोसोम्‍स और मिट्टी के संपर्क से पैदा होने वाले हेलमिंथ्‍स शामिल हैं। यह संक्रमण विकासशील देशों के आम संक्रमणों में से एक है। मामूली संक्रमण पर प्राय: ध्‍यान नहीं जाता, लेकिन गंभीर कृमि संक्रमण होने पर पेट में दर्द, कमजोरी, आयरन की कमी से पैदा होने वाली रक्‍त अल्‍पता, कुपोषण, शारीरिक विकास का रुकना आदि जैसे गंभीर रोग हो सकते हैं। संक्रमणों के कारण मानसिक कमजोरी हो सकती है तथा ऊतकों का नुकसान भी संभावित है, जिसके लिए शल्‍य चिकित्‍सा आवश्‍यक होती है।

विश्‍व स्‍वास्‍थ्‍य संगठन की सिफारिशें

कृमि संक्रमण को कम करने के लिए महामारी क्षेत्रों में रहने वाले स्‍कूल जाने की आयु वाले बच्‍चों के इलाज के लिए विश्‍व स्‍वास्‍थ्‍य संगठन ने समय आधारित औषध उपचार की सिफारिश की है। संगठन का कहना है कि पूरी दुनिया में स्‍कूल जाने की आयु वाले संक्रमित बच्‍चों की संख्‍या लगभग 600 मिलियन है, जिनकी डी-वॉर्मिंग करने से स्‍कूलों में उनकी उपस्थिति बढ़ेगी, उनका स्‍वास्‍थ्‍य ठीक होगा और वे सक्रिय होंगे। अधिकतर प्रकार के कृमि मुंह से लेने वाली दवा से मर जाते हैं। यह दवा बहुत सस्‍ती है और उसकी एक ही डोज दी जाती है।

इस तरह देखा जाए तो डी-वॉर्मिंग उपचार कठिन और महंगा नहीं है। इसे स्‍कूलों के जरिए आसानी से किया जा सकता है और उपचार के बाद बच्‍चों को बहुत फायदा होता है। पूरी दुनिया में अभी भी हजारों, लाखों बच्‍चे ऐसे हैं जिन्‍हें कृमि संक्रमण का जोखिम है। इनके उपचार के लिए स्‍कूल आधारित डी-वॉर्मिंग उपचार की नीति बनाई जानी चाहिए ताकि स्‍वास्‍थ्‍य, शिक्षा और विकास में तेजी आ सके।

सरकार की पहलें

राष्‍ट्रीय ग्रामीण स्‍वास्‍थ्‍य मिशन के तहत स्कूल स्‍वास्‍थ्‍य कार्यक्रम चलाया जा रहा है। कार्यक्रम में यह प्रावधान किया गया है कि वर्ष में दो बार निर्धारित अवधि में राष्‍ट्रीय दिशा निर्देशों के आधार पर डी-वॉर्मिंग की जाएगी। बिहार में विश्‍व की सबसे बड़ी स्‍कूल आधारित डी-वॉर्मिंग पहल की शुरुआत की गई थी। दिल्‍ली सरकार ने भी इसी तरह के अभियान चलाए थे। विश्‍व स्‍वास्‍थ्‍य संगठन के आंकड़ों के अनुसार 1 से 14 वर्ष आयु वर्ग के लगभग 24 करोड़ बच्‍चों को आंतों में पलने वाले परजीवी कृमियों से प्रभावित होने का जोखिम है।

नई योजना के तहत एक से 19 वर्ष की आयु वर्ग के स्‍कूल पूर्व और स्‍कूली आयु के बच्‍चों (पंजीकृत और गैर पंजीकृत) के डी-वॉर्मिंग करने का स्‍वास्‍थ्‍य मंत्रालय ने लक्ष्‍य निर्धारित किया है। पहले चरण के दौरान असम, बिहार, छत्‍तीसगढ़, दादर एवं नागर हवेली, हरियाणा, कर्नाटक, महाराष्‍ट्र, मध्‍य प्रदेश, राजस्‍थान, तमिलनाडु और त्रिपुरा जैसे 11 राज्‍यों/केंद्रशासित प्रदेशों के 14 करोड़ बच्‍चों को रखा गया है। दूसरे चरण के दायरे में लगभग 10 करोड़ बच्‍चों को रखा गया है। 10 फरवरी 2015 को राष्‍ट्रीय डी-वॉर्मिंग दिवस पर पहले चरण की शुरुआत की जाएगी। इसके तहत सभी लक्षित बच्‍चों को एलबेनडेजॉल की गोलियां दी जाएंगी। तदनुसार एक से दो वर्ष के बच्‍चों को इसकी आधी गोली और 2 से 19 वर्ष के बच्‍चों को इसकी पूरी गोली खिलाई जाएगी। जो बच्‍चे बच जाएंगे उन्‍हें 14 फरवरी 2015 तक इसके दायरे में लाकर डी-वॉर्म किया जाएगा।

स्‍वास्‍थ्‍य मंत्री ने इस बात पर जोर दिया है कि भारत को पोलियो मुक्‍त करने के बाद अब बच्‍चों में व्‍याप्‍त आंत में पलने वाले परजीवी कृमियों का इलाज करके देश को कृमि मुक्‍त भी बनाया जाएगा। उन्‍होंने स्‍कूली अध्‍यापकों सहित सभी सांसदों, विधायकों, स्‍थानीय निकायों के प्रतिनिधियों, आशा और आंगनवाड़ी कर्मियों का आह्वान किया कि वे एकजुट होकर सरकार के इस अभियान का समर्थन करें ताकि भारत को कृमि मुक्‍त देश बनाया जा सके।

इस पहल के लिए जरूरी है कि इसके साथ स्‍वच्‍छता और स्‍वास्‍थ्‍य में सुधार किया जाए तथा सुरक्षित पेयजल को उपलब्‍ध कराया जाए ताकि कृमि का जोखिम कम हो सके। इसके लिए महिला एवं बाल विकास मंत्रालय, मानव संसाधन विकास मंत्रालय, पंचायती राज मंत्रालय और जल एवं स्‍वच्‍छता मंत्रालय की सक्रिय भागीदारी और साझेदारी आवश्‍यक है। आशा की जाती है कि डी-वॉर्मिंग पहल से प्रधानमंत्री के स्‍वच्‍छ भारत के स्‍वप्‍न को पूरा किया जा सकता है।

इस छोटी परंतु आजमाई हुई पहल का स्‍वास्‍थ्‍य, शिक्षा और विकास जैसे विभिन्‍न क्षेत्रों पर बड़ा प्रभाव पड़ सकता है।

(लेखक पत्र सूचना कार्यालय, कोलकाता में निदेशक हैं)

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