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देवोत्थान एकादशी पर्व पर पूजा की संपूर्ण विधि

देवोत्थान एकादशी पर्व पर पूजा की संपूर्ण विधि

देवोत्थान एकादशी पर्व पर पूजा की संपूर्ण विधिदेवउत्थान या देवउठान एकादशी का त्योहार कार्तिक महीने में शुक्ल पक्ष की एकादशी को मनाया जाता है। आठ महीने पहले सोए हुए देवता इस दिन जगाए जाते हैं। इसी दिन से शादी आदि शुभ कामों को शुरू करने का सिलसिला चल निकलता है।

इस दिन फलाहारी व्रत रखा जाता है। कई स्थानों पर देवता दिन में उठाए जाते हैं तब बिना खाना खाए ही यह विधान संपन्न करना होता है। कुछ जगहों पर दिन छिपने के साथ देवता उठाए जाते हैं तो देवताओं को रात में खाना खाकर उठाया जाता है। अलग-अलग रिवाजों के तहत कहीं यह पूजा पुरुष करते हैं तो कहीं पर इसे महिलाओं द्वारा संपन्न कराया जाता है।

पूजन विधि

पहले आंगन की सफाई करके देव उत्थान का चूना और गेरू से चित्र बनाते हैं। बीच की जगह को लाल रंग से पोतकर ऐंपन से आठ देवताओं के चित्र काढ़े जाते हैं। उसके ऊपर पूजा की पुड़िया, चावल, गुड़, मूली, बैंगन, शकरकंद, सिंघाड़ा, चने का साग, बेर,गन्ना आदि रखते हैं। चारों और गन्ने के एक बराबर चार टुकड़े रख देते हैं। इसके ऊपर एक छोटी डलिया ढक देते हैं। चारों ओर घी के दीपक जलाए जाते हैं।

इस डलिया को उलट पलट कर हाथों की उंगली को स्पर्श करते हुए, मुंह से बोलकर देवताओं को उठाया जाता है। हल्दी औरचावल से पूजा करते हैं। गन्ने का रस निकालकर पिला देते हैं। पैर छूते हैं और फिर बधाइयां गाते हैं। एक बरतन में पानी भी रखते हैं। सब सामान दान कर दिया जाता है।

इस दिन खाने में कूटू की पूड़ी, पकौड़ी, शकरकंद और उबले हुए सिंघाड़े खाने का विधान है। 

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