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प्यार का खुमार और ‘श्रवण कुमार’

प्यार का खुमार और ‘श्रवण कुमार’

‘अरे…! यह प्यार-व्यार सब खुमार है, दो दिन में उतर जाएगा।‘ 'कुछ नहीं भावुक है, अभी ज़िन्दगी को करीब से नहीं देखा न, बस इसीलिए पागल हो रहा है।' 'चार किताबें पढ़ लेने से इन बच्चों का दिमाग खराब हो गया है।' 'एक बार शादी कर लो, उस लड़की को आसानी से भूल जाओगे।' 'अच्छा तुम्हें बाहर भेजा पढ़ने, यहां रहते तो कम से कम हमारी सुनते तो सही।' 'देख बेटा, हम उस लड़की को स्वीकार नहीं कर पा रहे, तू हमारी सुन ले, वरना हमारा बचना मुश्किल है।'

ऐसे न जाने कितने डायलॉग्स हैं जो बेहद पढ़े-लिखे लोग अपने बच्चों से बोलते हैं। अरे...! आप सारा त्याग अपने बच्चे से ही क्यों मांग रहे हैं? आप से स्वीकार नहीं होगा, आप समाज को नहीं झेल पाएंगे और न जाने क्या-क्या, लेकिन आपका बच्चा बस बलिदान हो जाए तो आपको तसल्ली भी मिलेगी और राहत भी, फिर चाहे वह ज़िन्दगीभर घुटन का शिकार ही क्यों न रहे।

आप चाहते हैं कि आपके बच्चे पढ़ें, सरकारी नौकरी करें लेकिन ‘सोच’ न बदलें। सोच वही रहे उनकी, आपकी तरह ‘वाहियात’ और ‘दकियानूसी’। नौकरी मिलने तक उसकी पढ़ाई आपको अच्छी लग रही थी लेकिन अब जब वह अपना जीवनसाथी अपने मन से चुनना चाहता है तो वही पढ़ाई उसे ‘संस्कारहीन’ बना रही है।

काश…! आप उन्हें खूंटे से बांध कर रखते। कम से कम वे आपके ‘श्रवण कुमार’ बने रहते लेकिन अब चूंकि इस श्रवण कुमार के कंधे हिलने लगे हैं तो आप बेचैन हो उठे। आपका सारा ‘जाहिलपन’ और ‘गंदगी’ सामने आने लगी..., पूरा परिवार विरोध में आ गया एकसाथ। अब वह लड़का जो कल तक परिवार का ‘आदर्श’ था अचानक से ‘स्वार्थी’ और ‘मक्कार’ हो गया।

स्वार्थी कौन है? आप या आपका लड़का, जरा सोचिए…! अरे, लेकिन आप कैसे सोच सकते हैं? क्योंकि समाज ने तो आपके दिमाग के दरवाजे ‘बंद’ कर दिए हैं। वह श्रवण कुमार है या नहीं, लेकिन आप ‘अंधे’ मां-बाप जरूर हैं।

लड़का सरकारी नौकरी में है, अच्छा कमाता है तो मां-बाप की नाक इतनी ऊंची हो गई क़ि अपने बच्चों के फैसलों के बीच ‘अड़’गई। संभल जाइए..., वरना डर यह भी है कि आपका ‘श्रवण कुमार’ आपको झटका देकर गिरा दे, आप अपने ‘अंधे’ होने का नाटक ख़त्म कर उसके साथ चलने की ‘कोशिश’ तो कीजिए...

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