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नींव का पत्थर ही बने रहना चाहते थे लाल बहादुर

नींव का पत्थर ही बने रहना चाहते थे लाल बहादुर

नींव का पत्थर ही बने रहना चाहते थे लाल बहादुरबात उन दिनों की है जब लालबहादुर शास्त्री ने इलाहाबाद के सार्वजनिक जीवन में प्रवेश किया ही था और जन सेवा का काम बड़ी रुचि के साथ करने लगे थे। वह एक कर्तव्यनिष्ठ स्वयंसेवक थे। अखबारी प्रचार-प्रसार में उनका ज्यादा विश्वास नहीं था।

एक दिन एक अन्य स्वयंसेवक ने उनसे पूछ ही लिया कि उनको अखबारों में अपना नाम छपवाने से इतना परहेज आखिर क्यों हैं?

शास्त्रीजी ने जवाब दिया कि ताजमहल में दो तरह के पत्थर लगे हैं। एक बढ़िया संगमरमर है जिसके मेहराब और गुबंद बने हैं।दुनिया उन्हीं की प्रशंसा करती है। दूसरे हैं नींव के पत्थर जो कि जमीन में गहरे दबे हुए हैं, जिनकी कोई प्रशंसा नहीं करता है।

इसके बाद गहरी सांस लेकर शास्त्रीजी ने बड़ी विनम्रता से उनसे अपनी मंशा जाहिर करते हुए कहा कि वह उसी नींव का पत्थर ही बने रहना चाहते हैं।

Last modified onFriday, 05 April 2019 20:04

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