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साल दर साल और प्रासंगिक हो रहे हैं महात्मा गांधी...

30 जनवरी, 1948 को महात्मा गांधी जब दैनिक प्रार्थना के लिए जा रहे थे तब वह गोली लगने से शहीद हो गए। वह भौतिक रूप से हमें छोड़ गए लेकिन उनकी शिक्षा, उनके निजी जीवन के तमाम प्रयोग, राजनीति और दर्शन आज भी भारत के और दूसरे देशों के लोगों के मस्तिष्क में ताजा हैं।

30 जनवरी, 1948 को महात्मा गांधी जब दैनिक प्रार्थना के लिए जा रहे थे तब वह गोली लगने से शहीद हो गए। वह भौतिक रूप से हमें छोड़ गए लेकिन उनकी शिक्षा, उनके निजी जीवन के तमाम प्रयोग, राजनीति और दर्शन आज भी भारत के और दूसरे देशों के लोगों के मस्तिष्क में ताजा हैं।

दुनिया के कोने-कोने में उन्हें क्यों याद किया जाता है? उनके दर्शन का कौन सा पक्ष है जो युवाओं को आकर्षित करता है और उन्हें गांधीवादी बना देता है? उनका जीवन उन लोगों के लिए आदर्श है जो व्यक्तिगत और प्रशासनिक स्तर पर अहिंसा का अनुसरण करना चाहते हैं।

महात्मा गांधी को याद करते वक्त सबसे पहले एक दुबले – पतले व्यक्ति की छवि सामने आती है जो चश्मा लगाता है, लंगोटी पहनता है और जो लाठी के सहारे तेजी से चलता है या खामोशी से बैठकर चरखा चलाता है। यह सादगी उनके जीवन और शिक्षा का प्रतीक है। उनके जीवन का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि उनकी कथनी और करनी में कोई अंतर नहीं था इसीलिए वह कहते थे, “विश्व को बदलने से पहले स्वयं को बदलो।” इसका अर्थ यह था कि बदलाव के बारे में बोलना और उसका सपना देखने के बजाय व्यक्ति को सबसे पहले खुद को बदलना चाहिए। उनके विचारों की एक बुनियाद अहिंसा थी। यह विचार केवल दार्शनिक और मानसिक स्तर पर ही नहीं था, बल्कि वह रोजाना जीवन में व्यक्तिगत और सामुदायिक स्तर पर उसे व्यवहार में उतारते थे। यह कोई खोखला सिद्धांत नहीं है जिसका मनुष्य अनुसरण करे, बल्कि इसमें कीट-पतंगों और पशुओं सहित सभी प्राणियों का सम्मान निहित है।

यद्यपि उन्हें एक ऐसे महान नेता के रूप में याद किया जाता है जिसने अंग्रेजी राज से स्वतंत्रता प्राप्त करने के लिए अहिंसा को राजनीतिक रणनीति के तौर पर इस्तेमाल किया, लेकिन उन्होंने यह जरूरत महसूस की थी कि अहिंसा को आम व्यक्ति के जीवन में शामिल किया जाए ताकि परिवार और समाज से शोषण समाप्त किया जा सके।

गांधी जी पहले आधुनिक शांतिवादी थे और उन्होंने शांतिवाद का प्रतिपादन किया था। इसका अर्थ युद्ध, सैन्यवाद और हिंसा का अहिंसा के माध्यम से विरोध करना होता है। इसे ‘सत्याग्रह’ के रूप में भी जाना जाता है, जो औपनिवेशिक शासन से आजादी हासिल करने का मुख्य हथियार था। उन्होंने कहा था कि इसे हासिल करने के लिए घृणा फैलाने की जगह क्षमाशीलता का अभ्यास करना चाहिए। उन्होंने कहा था, “क्षमाशीलता शक्तिशालियों का गुण होता है, कमजोर लोग कभी क्षमा नहीं कर सकते।” इसलिए वह अपने शत्रुओं का भी सम्मान करते थे। वह शत्रुओं के अच्छे गुणों को सामने लाते थे और धीरे-धीरे शत्रुओं को प्रेरणा देकर अपने साथ ले आते थे। यही कारण है कि जहां ब्रिटिश राज्य उनका शत्रु था वहीं कई अंग्रेज गांधी जी का समर्थन करते थे।

अपने विरोधियों या अपने विचारों और व्यवहार के आलोचकों के प्रति उनके मन में कोई घृणा नहीं थी। उनके लिए बदला लेना जहर फैलाने की तरह था, उनका मानना था कि आंख के बदले आंख का अनुसरण करने से तो पूरा विश्व ही अंधा हो जाएगा। 

महात्‍मा गांधी का जीवन सत्‍य और अहिंसा के अनुभव से भरा था जिसमें उन्‍होंने लोगों और मौजूद स्थितियों से लगातार सीखा। उनका कहना है कि ऐसे जियो मानो तुम्‍हें कल मरना है लेकिन सीखो ऐसे मानो तुम्‍हें सदा जीना है। उन्‍होंने अपनी गलतियों से बहुत कुछ सीखा और अपनी रणनीतियां में सुधार किया तथा अपने विचारों को अधिक प्रभावी बनाया। उनकी यह एक अनोखी उपलब्धि है कि उन्‍होंने 55,000 पृष्‍ठों पर अपने लेख लिखे, जिन्‍हें भारत सरकार ने संग्रह के रूप में सौ खंडों में प्रकाशित किया। हमें यह याद रखने की जरूरत है कि उन्‍होंने इतना लेखन हाथ से किया क्‍योंकि तब कम्‍प्‍यूटर नहीं थे।

गांधी जी को स्‍मरण करते हुए मौजूदा सरकार भी उनके विचारों को अभ्‍यास में लाने का प्रयास कर रही है। स्‍वच्‍छ भारत अभियान के बैनर के तहत शुरू किया गया स्‍वच्‍छता अभियान उनके विचारों से ही प्रेरित है। इसने जनता में जागरूकता पैदा की है और धीरे-धीरे जनता अपनी पुरानी आदतों को बदल रही है तथा स्‍वच्‍छता की अवधारणा को दैनिक जीवन में अपना रही है।

जलवायु परिवर्तन और वैश्विक गर्मी के मुद्दों से निपटने के लिए गांधी जी का सादा जीवन का दर्शन कम कार्बन पद चिह्न वाली जीवन शैली का आधार है। गांधी जी के इस पहलू को याद करते हुए केन्‍द्र सरकार ने गांधी जी के जन्‍मदिवस पर जलवायु परिवर्तन समझौते पर हस्‍ताक्षर किए। इस प्रकार गांधी जी राष्‍ट्रीय और अंतर्राष्‍ट्रीय वि‍षय पर अपने विचारों के माध्‍यम से जीवित हैं।

राष्‍ट्रीय स्‍तर पर वन्‍य संसाधनों के संरक्षण के लिए अंहिसक चिपको-अप्पिको आंदोलन की शुरुआत गांधी जी के विचारों से प्रेरित था। जिसका नेतृत्‍व पद्म भूषण सुन्‍दर लाल बहुगुणा जैसे सर्वोदय नेताओं ने किया।

अंतर्राष्‍ट्रीय स्‍तर पर नेल्‍सन मंडेला ने दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद शासन की समाप्ति के लिए गांधी जी के दर्शन को अपनाया। इस प्रकार अमेरिका में मार्टिन लुथर किंग जूनियर ने अहिंसा को अपनाया और अन्‍य अनेक लोग अहिंसा के मार्ग को अपनाकर न्‍याय के लिए अपने संघर्ष को आगे बढ़ा रहे हैं।

उनके इन शब्‍दों को याद करना उचित होगा कि जब तक मेरा विश्‍वास उजाला करेगा। मुझे उम्‍मीद है कि अगर मैं अकेला भी खड़ा हू तो मैं कब्र में भी जिंदा रहूंगा और वहीं से बोलता रहूंगा। यह सच्‍चाई है कि उनके विचार पूरी दुनियां में गूंज रहे हैं और उनका पंथ आगे बढ़ रहा है। आज हमें गांधी जी के विचारो को याद करने और उन्‍हें दैनिक जीवन में अपनाने की जरूरत है। केवल यही वह तरीका है जिसके द्वारा हम राष्‍ट्र पिता को सच्‍ची श्रद्धांजलि अर्पित कर सकते हैं।

(लेखक पत्रकार हैं और इस लेख में व्‍यक्‍त विचार व्‍यक्तिगत हैं।)

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