थार के रेत में आपदाओं के जोखिम को कम करने की कवायद

  • Written by  बिनोय आचार्य
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बिनोय आचार्य

पश्चिमी राजस्थान में रहने वाले घेवर राम और गौरी देवी के पास केवल डेढ़ बीघा ज़मीन है। सूखे की मार के चलते उन्हें हर बार आजीविका की तलाश में इधर से उधर विस्थापित होना पड़ता था लेकिन अब यह सिलसिला थम गया है। दरअसल अब उन्होंने बागवानी-चारागाह प्रणाली को अपना लिया है। (Read in English)

इस परिवार ने सबसे पहले बेर, गूंदा, करौंदा और नींबू जैसी स्थानीय प्रजातियों के पौधों को लगाया, वर्षा जल संचयन टैंक का निर्माण किया और आवारा पशुओं से फसल को नष्ट होने से बचाने के लिए चारों ओर चारदीवारी बना दी। अगले वर्ष, गौरी देवी ने अपने खेत में कई फसलों को का उत्पादन एक साथ के क्रम में ग्वार की भी शुरुआत कर दी। दूसरे वर्ष के अंत तक, खेत से लाभ मिलने लगा। यह परिवार खेत में केवल दो घंटे अधिक काम करके, कई अन्य फसलों का उत्पादन करने में भी सफल रहा जिसके परिणामस्वरूप इन्हें लाभ के रूप में इस खेत से चारा, फल, सब्ज़ियां और कई अन्य उत्पाद मिलने लगे। घेवर राम यह बताते हुए काफी उत्साहित होता है कि उसके खेत से प्राप्त होने वाली आय कम से कम दस गुणा तक बढ़ गई है।

उम्मीद और पुनरुद्धार की ऐसी ही कई अन्य कहानियां पश्चिमी राजस्थान में फैले व्यापक रेगिस्तानी क्षेत्र से आनी शुरू हो गई हैं। कमज़ोर समुदायों की वित्तीय स्थिति को मज़बूत करने के लिए सरकार द्वारा किए जा रहे निरंतर प्रयासों और ‘उन्नति’ जैसे विभिन्न गैर सरकारी संगठनों द्वारा निभाई जा रही सक्रिय भूमिका के चलते सूखा प्रभावित क्षेत्रों में लोगों की आजीविका को सुदृढ़ करने में धीरे-धीरे ही सही, मगर प्रभावशाली बदलाव सामने आए हैं। वर्ष 2015 में जापान के सेंडई में आयोजित हुई तीसरे संयुक्त राष्ट्र विश्व सम्मेलन में अपनाए गए “सेंडई आपदा जोखिम न्यूनीकरण ढांचा (एसएफडीआरआर)” के अंतर्गत आजीविका में कमी और आपदा जोखिमों को कम करने की दिशा में निरंतर कार्य किया जा रहा है। वर्ष 2015 के बाद के विकास के एजेंडे के अंतर्गत, पहले सबसे बड़े समझौते पर हस्ताक्षर करने वाले देशों में भारत भी एक है। यही वजह है कि पर्यावरण, आजीविका और आर्थिक विकास की दिशा में आपदा की आशंकाओं को कम करने वाले विकल्पों को चुनने और उन पर कार्य करने की दिशा में भारत वचनबद्ध है।

पश्चिमी राजस्थान के विपरीत परिस्थितियों वाले इलाकों में रहने वाले लोगों की पीड़ा और दर्द उनकी लोक कथाओं का हिस्सा है। सातकाल, सत्ताइसजमना, त्रिसथकुरिआकचा, तीन काल, आइसापडेला, मापूत, मिले नपाचा आदि वहां की स्थानीय कथाएं रही हैं। इसका मतलब है कि प्रत्येक 100 वर्षों में से केवल 27 वर्ष का समय ही यहां अच्छा होता है। यहां सात वर्ष सूखे के रहते हैं, 67 वर्षों तक भयंकर सूखा पड़ता है और तीन साल इतने अधिक संकट के रहते हैं, जिस वजह से एक मां और उसका बच्चा मज़बूरन एक-दूसरे से अलग हो जाते हैं। अपने अस्तित्व के पारंपरिक तौर पर बनाई जाने वाली रणनीतियों में प्रभावी जल प्रबंधन, पशुपालन, मिश्रित कृषि एवं संयुक्त इच्छा शक्ति शामिल हैं। ‘दास होवे चौखीबकरियां, एकसांतरों ऊंट, दास होवे खेजड़ला, तो कालकाड दू कूट’ – अर्थात एक परिवार सूखे से तभी निपट सकता है, यदि उसके पास 10 बकरियां, एक ऊंट और 10 खेजड़ी के पेड़ (खेजड़ी बहुउद्देश्य वाला वृक्ष है, जिसके हिस्से को भोजन, जानवरों के लिए चारा और घर बनाने के लिए कच्चे सामान के तौर पर उपयोग किया जाता है) हों।

छोटे और हाशिए पर मौजूद किसान, जिनकी 78 फीसदी के करीब आबादी, सिंचाई के लिए वर्षा पर निर्भर, इनकी आजीविका का प्राथमिक स्रोत पशु ही हैं। ये लोग पारंपरिक रूप से सामान्य सामुदायिक भूमि और संसाधनों पर ही भरोसा करते हैं। बड़े किसानों द्वारा खेती के लिए व्यक्तिगत जल आपूर्ति प्रणाली की ओर रुख करने के चलते, सामान्य समुदायों द्वारा उपयोग में लाए जाने वाले ओरन एवं गौचर (समुदाय चराई भूमि) तथा नदी (ग्रामीण तालाब) जैसे आम संपत्ति संसाधन (Common Property Resources - CRPs) काफी तेज़ी से घट रहे थे। इसका सीधा परिणाम यह हुआ कि हाशिए पर मौजूद आबादी के लिए खाद्य एवं चारा असुरक्षा, ग़रीबी और विस्थापन तेज़ी से बढ़ने लगा।

जलवायु संबंधी ख़तरों की तीव्रता और आवृति में वृद्धि की वजह से वर्ष 1961 के बाद से लगातार सूखे की घटनाओं में वृद्धि होती रही है। करीब 80 फीसदी कृषि वर्षा से होने वाली सिंचाई पर आधारित है। राजस्थान के थार रेगिस्तान क्षेत्र में सालाना औसतन 100 से 300 एमएम के बीच वर्षा होती है। इसके अतिरिक्त एक तथ्य यह है कि उच्च क्षमता वाले रेगिस्तान की मिट्टी में पोषक तत्वों की कमी है और इसमें नमी की मात्रा भी काफी कम है।

ऐसे में सूखे के खिलाफ समुदाय की कार्यप्रणाली एवं सोच में बदलाव के लिए सीपीआर को फिर से जीवित करना अत्यंत महत्वपूर्ण था। पश्चिमी राजस्थान में बागवानी-चारा भूखंडों और वर्षा जल संचयन टैंकों को विकसित के लिए ‘उन्नति’ छोटे तथा हाशिए पर बैठे किसानों की मदद कर रहा है। यह पशुओं में बीमारी दर और मृत्युदर को कम करने के साथ-साथ मलेरिया की रोकथाम के लिए किसानों को पशु चिकित्सा देखभाल की सुविधा भी मुहैया करा रहा है।

ऐसा माना जाता था कि रेगिस्तानी इलाकों और परिस्थितियों में बागवानी को प्रोत्साहित नहीं किया जा सकता। मगर अब घेवर राम और गौरी देवी वे उदाहरण हैं जो इस बात का प्रमाण देते हैं कि लोग इस विकल्प को आज़माने की दिशा में अपनी इच्छा ज़ाहिर कर रहे हैं। इसका पूरा श्रेय, केन्द्रीय शुष्क क्षेत्र अनुसंधान परिषद् (Central Arid Zone Research Institute) और अन्य किसान विकास केन्द्रों द्वारा किए गए प्रयोगों और प्रशिक्षणों को जाता है। इन्होंने किसानों को नियमित आधार पर प्रशिक्षण और विशेषज्ञता उपलब्ध कराई। इन्होंने भूखंड मालिकों को इंटरफेस की सुविधा भी उपलब्ध कराई ताकि वे आसानी से पौधों की किस्मों और संयोजन के बारे में सलाह-मशविरा प्राप्त कर सकें।

पिछले कुछ वर्षों के दौरान, स्थानीय संसाधन नागरिकों के तौर पर कार्य करने के लिए कई स्वयंसेवकों को प्रशिक्षित किया जा चुका है, जो बागवानी-चारागाह प्रणाली, कलम बांधने की प्रक्रिया और बीजों के विकल्पों के बारे में सरकार के साथ-साथ किसानों को भी मदद कर सकते हैं। इससे, प्रारंभिक वर्षों में खेती की ओर फिर से रुख करने वाले और पशुधन तकनीक का फायदा उठाने वाले वंचित किसानों, विशेषरूप से महिलाओं को सूखे से निपटने और खुद को अधिक सक्षम बनाने में मदद मिली है।

अंतर-फसल (एक से अधिक फसल को एक साथ विकसित करना) से बेहतर उपज उपलब्ध कराकर वृक्षारोपण और घेराबंदी मिट्टी की उर्वरता को बढ़ाते हैं। इसने पशुधन के लिए चारे के तौर पर उपयोग में लाई जाने वाले 21 स्थानीय घास एवं झाड़ियों की प्रजातियों को पुनः सृजित होने के लिए प्रेरित किया है। इनमें से कुछ को लोगों द्वारा सब्ज़ियों के रूप में इस्तेमाल भी किया जाता है। ये मिट्टी की पोषकता को बढ़ाने और मिट्टी के अपरदन को रोकने में भी योगदान देते हैं।

वर्षा जल संग्रहण ढांचा, बागवानी-चारागाह भूखंड, विशेषीकृत पशु सुरक्षा, चारा बैंक और मलेरिया रोकथाम एवं उपचार को छोटे और वंचित किसानों के लिए सुलभ बनाने से यह बात साबित हो गई है कि राजस्थान के रेगिस्तानी इलाकों में सूखा की समस्या से निपटने में इनका विशेष उपयोग एवं योगदान है। यह छोटे एवं वंचित किसानों के पशुओं की सुरक्षा और उनके लिए चारे की व्यवस्था को बेहतर कर इन किसानों की अनुकूलन क्षमता को बढ़ाता है।

महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी योजना के तहत कई गांव एवं हमारी ग्रामीण आबादी की आजीविका को सुरक्षित करने के उद्देश्य को पूरा करने में लगे ब्लॉक स्तर पर कार्य करने वाले कई पदाधिकारी भी, अब बागवानी-चारागाह भूखंड विकास प्रणाली को अपनी वार्षिक योजना में शामिल करना चाहते हैं। निरंतर और समावेशी विकास की दिशा में आपदा जोखिम में कमी को अन्य सामाजिक सुरक्षा योजनाओं के उद्देश्यों के साथ जोड़कर आगे ले जाया जा सकता है। इस इस पूरी प्रक्रिया को सफल बनाने की दिशा में एक बेहतरीन उदाहरण है। हरिता घेराबंदी और जल संग्रहण टैंकों का निर्माण जैसे कार्यों को राजस्थान में महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी योजना के तहत मान्यता भी दी जा चुकी है। इससे व्यापक स्तर पर तेज़ी से बढ़ रही बागवानी-चारागाह प्रणाली को पूरे राज्य में स्वीकार्यता मिलने में मदद मिली है। अब अधिक से अधिक छोटे किसान कृषि की इस प्रणाली की ओर रुख कर रहे हैं।

सेंडई ढांचा के अंतर्गत जिस “सर्व समाज दृष्टिकोण” की कल्पना की गई थी, उस दिशा में लिंग एवं वर्ग आधारित ये छोटे मगर संतोषजनक उपाय एक सकारात्मक कदम है।

वैसे तो भारत आपदा से निपटने की दिशा में निश्चित रूप से सफलता हासिल कर रहा है, मगर अभी भी लंबी दूरी तय किया जाना बाकी है। चूंकि आपदाएं किसी भी राष्ट्र की सीमाओं में बंधी नहीं होती, ऐसे में सेंडई फ्रेमवर्क को व्यापक स्तर पर संपूर्ण एशिया प्रशांत क्षेत्र में लागू करने की अत्यधिक आवश्यकता है।

इसको महसूस करते हुए, संयुक्त राष्ट्र आपदा जोखिम न्यूनीकरण कार्यालय (United Nations Office for Disaster Risk Reduction - UNISDR) के सहयोग से भारत सरकार, “एशियन रिस्क रिडक्शन (AMCDRR)” विषय पर एशियन मंत्रालयी सम्मेलन का आयोजन कर रहा है। यह सम्मेलन 03 नवंबर से 05 नवंबर तक नई दिल्ली में आयोजित किया जाएगा, जिसमें एशियाई देशों पदाधिकारियों और आपदा प्रबंधन विशेषज्ञों की भागीदारी होगी। इस दौरान मज़बूत, सुरक्षित और आपदा मुक्त एशिया को लेकर एक व्यापक ख़ाका तैयार किया जाएगा।

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