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गांधीजी ने यूं अपनाई धोती...

गांधीजी ने यूं अपनाई धोती...

करीब 95 वर्ष पहले गांधीजी ने 22 सितम्बर 1921 को अपने पहनावे में परिवर्तन करने का महत्वपूर्ण निर्णय लिया। एक सुपरिष्कृत गुजराती पहनावे के स्थान पर उन्होंने केवल एक साधारण धोती एवं शॉल पहनने का फैसला किया। (Read in English)

गांधीजी ने यह युगांतरकारी निर्णय मदुरई में तब लिया जब उन्होंने फैसला किया कि उन्हें भारत के निर्धनों के लिए उनके साथ मिलकर कार्य करना है और उनसे अलग कपड़े पहनकर वह स्वयं की पहचान कैसे बना पाएंगे। यहां तक कि उन्होंने विदेश में भी और जीवन के अंतिम समय तक यही वेशभूषा बनाए रखी तथा उनको अपने निर्णय पर कभी अफसोस नहीं हुआ, जैसा कि वह लिखते हैं... “अपने जीवन में मैंने जितने भी परिवर्तन किए हैं वे सभी महत्वपूर्ण अवसरों से प्रभावित रहे हैं; और वे इतना सोच-विचारकर लिए गए हैं कि मैं उनपर कदाचित ही अफसोस करता हूं और मैंने वह फैसले लिए क्योंकि उनको लिए बगैर मैं नहीं रह सकता था। अपने पहनावे में इतना बड़ा परिवर्तन मैंने मदुरई में किया।”

गांधीजी ने यूं अपनाई धोती...निर्धन जनता के साथ स्वयं को खड़ा करने का गांधीजी का निर्णय क्षणिक निर्णय नहीं था। इस बारे में वह लंबे समय से विचार कर रहे थे। इससे पहले दो अवसरों पर उन्होंने आम आदमी का पहनावा अपनाने के बारे में सोचा किंतु अंततः मदुरई (तमिलनाडु) में उन्होंने एक ग़रीब किसान का पहनावा अपनाने का फैसला लिया। बाद में उन्होंने टिप्पणी की कि मदुरई ही वह स्थान था जिसने उनको अपने पहनावे के बारे में निर्णय लेने की शक्ति प्रदान की, हालांकि इससे पहले कुछ एक अवसरों पर वह यह निर्णय लेने के करीब आए किंतु पूरी तरह इस पहनावे को नहीं अपना सके। महात्मा ने कहा कि अंततः मदुरई ने उनको अपने परम्परागत पहनावे को  ‘धोती’ में तब्दील करने के लिए आवश्यक शक्ति प्रदान की।

गांधीजी ने उस घटना का विवरण दिया जिसने उनको अपने औपचारिक पहनावे को बदलने के लिए बाध्य किया... “मद्रास से ट्रेन में मदुरई आते समय मैंने वह भीड़ देखी जिसको जो हुआ उससे लेशमात्र भी सरोकार नहीं था। वे सभी लोग बिना किसी अपवाद के विदेशी परिधान पहने थे। मैंने उनमें से कुछ लोगों से बातचीत की और खादी पहनने की प्रार्थना की... उन्होंने सहमति में सिर हिलाया और कहा, ‘खादी खरीदने के लिहाज से हम अत्यंत ग़रीब हैं और यह बहुत प्रिय वस्त्र है।’ मुझे इस प्रतिक्रिया में छुपी हुई सच्चाई का अहसास हुआ। मैं अपनी गंजी, टोपी और धोती पहने था। यह केवल अधूरा सच बयां करते थे, अधनंगा रहने के लिए बाध्य लाखों लोग जो चार इंच चौड़ी और इतने ही फीट लंबी लंगोटी के लिए धन की बचत करते हैं, अपने इन उघड़े हुए अंगों के माध्यम से नग्न सच दर्शाते हैं। अपने वस्त्रों को परिवर्तित करने के सिवाय मैं उनको और कौन सा प्रभावशाली उत्तर दे सकता था और मैंने अगली ही सुबह मदुरई की बैठक के बाद यह किया।”

इस यात्रा के दौरान मदुरई तक यह विचार उनके मन में बार-बार कौंधता रहा जहां, 22 सितम्बर 1921 को गांधी ने हमेशा के लिए एक साधारण धोती और एक शॉल का पहनावा अपनाने का निर्णय लिया। वह मदुरई की वेस्ट मासी स्ट्रीट पर अपने एक अनुयायी के घर (दरवाज़ा नंबर 251) के ऊपरी भाग पर ठहरे थे। इस शहर में उनकी यह दूसरी यात्रा थी; बाद में वह यहां तीसरी बार आए। उस सुबह जैसे ही गांधीजी रामंद (रामनाथपुरम) और उसके बाद तिरुनेवेली जाने के लिए बाहर आए, वह नए अवतार में दिखे जो स्वयं में एक फैशन स्टेटमेंट था, यदि ऐसा कहा जा सके! संयोगवश, यही मकान आजकल खादी एम्पोरियम के पास है!

जब मदुरई से वह अपनी यात्रा पर आगे बढ़े तो उनको रास्ते में लोगों की बधाईयां स्वीकार करने के लिए रुकना पड़ा और वह स्थान जहां वह पहली बार अपने नए पहनावे धोती में सार्वजनिक रूप से प्रस्तुत हुए उसको अब ‘गांधी पोत्तल (खुला मैदान)’ कहा जाता है। मदुरई में कामराजार रोड पर अलंकार थियेटर के पास गांधीजी की एक भव्य प्रतिमा भी है।

यद्यपि गांधीजी यह नहीं चाहते थे कि सभी उनकी इतनी साधारण वेशभूषा को अपनाएं। उन्होंने नवजीवन में लिखा... “मैं नहीं चाहता कि मेरे सहकर्मी या पाठक धोती को अपनाएं। किंतु मेरी प्रबल इच्छा है कि वे विदेशी वस्त्रों के बहिष्कार का अर्थ पूरी तरह समझें और इन वस्त्रों का बहिष्कार और खादी का उत्पादन सुनिश्चित करने हेतु अपने सर्वश्रेष्ठ प्रयास करें। मेरी इच्छा है कि वे यह समझें कि स्वदेशी ही सब कुछ है।” 

अपने पहनावे में इतने बड़े परिवर्तन से उनको प्रशंसा, निंदा और तनी हुई भृकुटियां भी झेलनी पड़ी। गांधीजी और सभी भारतीय प्रतिनिधियों को गोलमेज सम्मेलन में दोपहर की चाय के लिए जॉर्ज पंचम का अनमना निमंत्रण एक दिलचस्प उपाख्यान है; अनमना इसलिए क्योंकि गांधीजी का निर्धन व्यक्ति वाला पहनावा वहां के शिष्टाचार के विरुद्ध था। किंतु, गांधीजी भी पहले ही राजा से मिलने पर भी पहनावा न बदलने की घोषणा कर अपना दृढ़ इरादा दर्शा चुके थे। उनका रुख़ स्पष्ट था कि ब्रिटेन के कारण भारत के निर्धन वस्त्रहीन थे। बाद में जब पूछा गया कि राजा से मिलने के लिए क्या वह पर्याप्त कपड़े नहीं पहनेंगे, बताया जाता है कि गांधीजी ने अपने सुप्रसिद्ध उत्तर में कहा, “राजा के पास हम दोनों ही के लिए पर्याप्त है।” इससे अच्छा प्रत्युत्तर नहीं हो सकता था।

धोती पर गांधीजी का संदेश

‘अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी द्वारा विदेशी वस्त्रों का संपूर्ण बहिष्कार करने के लिए हमारे पास केवल चंद दिन बचे हैं। लाखों लोग छोड़े गए वस्त्र का खादी से विस्थापन करने के दृष्टिकोण से काफी निर्धन हैं। मैं उनके लिए मद्रास तट पर दी गई अपनी सलाह दोहराता हूं। उनको केवल धोती से ही संतुष्ट रहना चाहिए। हमारे यहां के मौसम में वर्ष के गर्म महीनों में अपने शरीर की रक्षा के लिए हमें शायद ही अधिक वस्त्रों की आवश्यकता है। वेशभूषा के लिए कोई पाखंड न होने दीजिए। सांस्कृतिक रूप से भारत में पुरुषों के लिए संपूर्ण शरीर को ढकने पर कभी भी ज़ोर नहीं दिया गया है। मैं पूर्ण उत्तरदायित्व बोध के साथ यह सलाह देता हूं। अतएव 31 अक्टूबर तक उदाहरण प्रस्तुत करने के लिए मैं गंजी और टोपी त्यागने का प्रस्ताव करता हूं एवं जब भी शरीर को ढकने की आवश्यकता प्रतीत होगी, स्वयं को केवल एक धोती और चादर (शॉल) तक सीमित करता हूं। मैंने इस परिवर्तन को इसलिए अपनाया है क्योंकि मैं हमेशा किसी को ऐसी सलाह देने से हिचकिचाता हूं जिसका पालन करने के लिए मैं स्वयं तैयार नहीं हूं, साथ ही मैं ऐसा इसलिए भी कर रहा हूं क्योंकि जो लोग विदेशी वस्त्रों को ठुकराने में समर्थ नहीं हैं मैं उनका रास्ता आसान बनाने के लिए नेतृत्व प्रदान कर रहा हूं। मेरे लिए यह परित्याग शोक के प्रतीक के रूप में भी आवश्यक है, एवं केशहीन सिर एवं नग्न शरीर भी देश में मेरे हिस्से में शोक का ही प्रतीक माने जाते हैं। हम शोक में हैं क्योंकि वर्षांत निकट है और अब भी हमें स्वराज की प्राप्ति नहीं हुई है। मैं स्पष्टतया बता देना चाहता हूं कि मैं नहीं चाहता कि मेरे सहकर्मी गंजी और टोपी का प्रयोग तब तक करना छोड़ें जब तक कि उनको अपना कार्य करने में इसकी आवश्यकता प्रतीत न हो।’

नि:संदेह, महात्मा ने जो कहा उसका पालन किया! यही कारण है कि उनका जीवन- एक खुली किताब- स्वयं में एक संदेश है। 

(लेखक पत्रकार हैं। आलेख में पेश विचार उनके निजी हैं।)

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