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दूर देश रह रहे भारतवंशियों के मन में बसा है भारत...

साल 1990 में जब सद्दाम हुसैन की ईराकी सेनाओं ने कुवैत पर हमला किया तो मुतुन्नि मैथ्‍यूज ने, जिन्‍हें टोयोटा सनी के नाम से अधिक पहचाना जाता है, मसीहा मैथ्‍यूज बनकर वहां फंसे भारतीयों की जीवन रक्षा की। सनी ने जैसा अनोखा कार्य किया उससे कुवैत युद्ध में फंसे 1,70,000 हजार भारतीयों को 488 उड़ानों के जरिए भारत लाने में बड़ी मदद मिली।

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भारत छोड़ो : एक आंदोलन जिसने रखी भावी राजनीति की नींव

Quit India: Movement That Prepared Ground For Future Politics In Indiaसाल 1942 का साल... हिन्‍द महासागर से उठी मानसून की हवाएं भारत पहुंच चुकी थीं। उनके साथ ही घमासान नौसैनिक युद्ध की खबर भी पहुंची। विश्‍व दो ध्रुवों में बंट चुका था। भारत भी उबल रहा था और सदियों पुरानी दासता की बेड़ियों को तोड़ डालने का इंतजार कर रहा था। ऐसे वक्‍त में विश्‍व युद्ध में ब्रिटेन को भारत के समर्थन के बदले में औपनिवेशिक राज्‍य का दर्जा देने के प्रस्‍ताव के साथ सर स्‍टैफर्ड क्रिप्‍स का भारत आगमन हुआ। ब्रिटेन ने महारानी के प्रति निष्ठा के बदले में भारत को स्‍वशासन देने का प्रस्‍ताव किया लेकिन उनको इस बात का अहसास नहीं था कि शहीद भगत सिंह और चंद्रशेखर आजाद जैसे क्रांतिकारियों ने देश को उपनिवेश बनता देखने के लिए अपने जीवन का वलिदान नहीं किया था। देशभर के स्‍वतंत्रता सेनानियों की एक ही मांग थी, और यह थी पूर्ण स्‍वराज। इसलिए 8 अगस्‍त 1942 की पूर्व संध्‍या पर गांधीजी ने देशवासियों के समक्ष शंखनाद करते हुए कहा, ‘ये एक छोटा-सा मंत्र है जो मैं दे रहा हूं। आप चाहें तो इसे अपने हृदय पर अंकित कर सकते हैं और आपकी हर सांस के साथ इस मंत्र की आवाज आनी चाहिए। ये मंत्र है –‘करो, या मरो’। (Read in English: Quit India: Movement That Prepared Ground For Future Politics In India)

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फैशन में खादी, फिर से घूमी चर्खे की चकरी

Khadi In Vogue Again, Wheels Of Charkhas Bustling Afreshएक शताब्‍दी से भी अधिक गुजरे जब महात्‍मा गांधी दक्षिण अफ्रीका से भारत लौटे तो उन्‍होंने चरखा देखा तक नहीं था। मगर स्‍वदेशी आंदोलन के दौरान वह राष्‍ट्रीय जीवनशैली का अनुसरण करते हुए बड़े मनोयोग से चरखा चलाने लगे थे। (Read in English: Khadi In Vogue Again, Wheels Of Charkhas Bustling Afresh)

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अगस्‍त क्रांति : 'भयावह' स्थितियों में लड़ाई का 'अहिंसक' तरीका

8 अगस्‍त, 1942 को पारित ‘भारत छोड़ो’ संकल्‍प से भारत के स्‍वतंत्रता संग्राम में एक निर्णायक मोड़ की शुरुआत हुई। गांधी जी को लगा कि सत्‍य और अहिंसा के आदर्श की अग्निपरीक्षा की घड़ी आ गई है। विश्‍व युद्ध का दौर था। भारत पर कठोर साम्राज्‍यवादी शासन की तानाशाही जारी थी। धुरी राष्‍ट्रों से हमारी मातृभूमि पर हमले की धमकियां मिल रही थीं। ऐसे माहौल में स्‍वतंत्रता सेनानी एक ऐसी मानवीय रणनीति बनाने में लगे थे जिसमें हत्‍याओं, विनाश और विश्‍वासघात की कोई जगह न हो, ताकि पुरानी सभी गलतियों को सही किया जा सके। उन्‍होंने अपनी इस मुहिम में जीत हासिल कर न सिर्फ अपने आप को सही साबित किया बल्कि मानवता को सभ्‍यता का एक अनोखा पाठ भी सिखाया।

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