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प्रेम का भूगोल

प्रेम का भूगोल

भूगोल में, पहाड़ों से निकली नदी के समुद्र में मिलने तक की प्रक्रिया को, तीन अवस्थाओं में बांटा गया है। मुझे प्रेम की संपूर्णता में भी इन अवस्थाओं से साम्य नजर आया है हमेशा...

जिस तरह नदी शुरू में युवावस्था में होती है और उसमें प्रवाह, वेग और कटाव बहुत तीव्र होता है, ठीक उसी तरह प्रेम शुरुआत में बेहद चंचल, तीव्र भाव से हृदय को सीधा वेधता हुआ चलता है। यह प्रेम के आकर्षण की युवावस्था ही है। उसके बाद नदी आगे मैदानों में आकर थोड़ी मंद पड़ जाती है और हल्का लहरदार मोड़ बनाती हुई किनारों को काटते हुए धीमे-धीमे मदमस्त होकर चलती है..., ठीक ऐसे ही प्रेम भी अपने प्रारंभिक आकर्षण से निकलकर जब थोड़ा परिपक्व होने की तरफ बढ़ता है तो यह दोनों प्रेमियों के व्यक्तित्व के किनारों को काटकर, उनको एक दूजे के सांचे में ढालने लगता है और अब प्रेमपाश, प्रेम में पड़े लोगों को जीवन की लहर पर धीमे-धीमे आगे लेकर बढ़ता है।

अतत:, नदी अपनी अंतिम अवस्था में आकर एकदम शांत और धीमी हो जाती है…, अब उसमें ठहराव आने लगता है और आखिरकार वह सागर से मिल जाती है। ठीक यही प्रेम की वह अवस्था है... जब प्रेम में ठहराव है और विचलनशून्यता आ जाती है। यहां प्रेमी और प्रेमिका में व्यक्तित्वभिन्नता होकर भी उसका कोई बोझ नही रह जाता और नदी की तरह ही, प्रेम इस अवस्था में सारी भिन्नताओं का डेल्टा बनाकर, अन्त में सागर रूपी आध्यात्मिक प्रेम के स्वरूप को पा लेता है। यह प्रेम का सर्वोच्च है जहां इच्छा-अनिच्छा से ज्यादा महत्व सिर्फ ‘साथ’ होने का है…, वैसे ही जैसे नदी सागर की हो जाती है।

इसलिए…, नदी रूपी प्रेम को प्रवाहित करते रहिए ताकि यह सागर तक पहुंच सके और कहीं गलती से भी बीच रास्ते में ही सूख न जाए।

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