Menu

 


'वाक्यांश' से गुजरते हुए...

राजेंद्र आहुतिकवि-कथाकार राजेंद्र आहुति के 'वाक्यांश' (कविता-संग्रह) को पढ़ते हुए एक सुखद रचनात्मक अनुभूति होती है।  रोजमर्रा के जीवन से कदमताल करते, जीवन की कठिनाईयों और सच्चाईयों से मुठभेड़ करते हुए राजेंद्र आहुति कविता लिखते हैं। उनकी गहन अनुभूति से उपजी कविताएं इस मामले में बेपरवाह हैं कि कविता को आप कैसे देखते-समझते हैं! वह आपकी अनुभूति हो सकती है! कवि प्रयोगधर्मी है। रूप और अन्तर्वस्तु के अकादमिक विमर्श से अलग अपनी राह चलते रहने को प्रस्तुत...

जीवन-जगत की ज्वलंत समस्याओं, चिंताओं और सरोकारों को उसी मूल अर्थ में समझे बिना कविता का असल मर्म नहीं समझा जा सकता।

कवि राजेंद्र ब्यौरों में जाकर कविता रचते हैं। जीवन-जगत के प्रत्येक कार्य-व्यापार, समय-सन्दर्भ और विचार में कवि गहरे रूपों में उतरकर सघन जीवनानुभवों से कविता रचता है।  

राजेंद्र कथाकार भी हैं लेकिन मूलतः कवि हैं। उनका कथाकार, कविता रचाव की प्रक्रिया में अन्तर्वस्तु और शिल्प के साथ मौजूद रहता है।

'वाक्यांश' के रचनाकार घर-परिवार की चिंताओं तक महदूद नहीं हैं बल्कि बनारस से लेकर, समाज-संस्कृति, साइकिल, प्रकृति के रंग और अन्य अनेक जीवनानुभवों से आबद्ध हैं। 

नवजात, बच्चे, बच्चों की मुस्कान, हमारी मां, मां और बेटा, पिता,  दादा और पोता --- राजेंद्र आहुति के पास रिश्ते-नातों, पारिवारिक संबंधों की न जाने कितनी सघन अनुभूतियां है। 'पिता' शीर्षक कविता को देखें – “तुम्हारी उपस्थिति में / जो छत अपने आंगन से / हर पर खुलकर करती थी बतरस / एक और दीवार खड़ी होती देख / वह छत चुपचुप है।” 

“-- कई तरह के पारिवारिक झंझावात के ब्रेकर / जब टकराते हैं दिमाग के सन्नाटों से / तो तमाम परिवर्तनों के बावजूद / पिता तुम्हारी बहुत याद बहुत आती है।” ‘पिता’ शीर्षक कविता संग्रह की श्रेष्ठ कविताओं में से एक है।

अधिकांश लंबी कविताओं में शब्द-चित्र खींचते कवि की कल्पना शक्ति अद्भुत है। 

सबसे बड़ी बात यह कि वह संवेदना की अनंत गहराइयों से चीज़ों को देखते हैं। कवि के पास बनारस के हजारों सालों की साहित्यिक-सांस्कृतिक विरासत की आदिम गंध है। बनारस और गंगातट को जीते हुए एक फक्कड़मस्ती है। साइकिल से मोबाइल और चुनाव चिह्न ही नहीं भटकन तक कविता की सम्भावना कवि के रचनात्मक आत्मविश्वास और अनुभूति का परिचायक है। ऐसे ही कविता संभव नहीं, जब तक आपमें सूक्ष्म अवलोकन के विनियोग की शक्ति नहीं। 

पंडित वासुदेव शास्त्री, वाचस्पति का घरेलू कुत्ता, उषा वर्मा लिए, लवलीन की स्मृतियां, कथाकार रामदेव सिंह के लिए, मैं अन्ना हूं -- और अनेक कविताओं की विषय-भूमि और काव्य-संवेदना से राजेन्द्र आहुति की अद्भुत सृजनात्मकता का पता चलता है। उनके प्रयोग सिर्फ उनके प्रयोग नहीं है, बल्कि बनारस के परिवेश, साहित्यिक प्रेरणा और रचनात्मक अनुकरण का भी योगदान है। 

अस्सी चाय की अड़ी तक कवि सीमित नहीं है, उसके अनुभव संसार में दिल्ली की मेट्रो ट्रेन भी है। समाज, संस्कृति, राजनीति,  अध्यात्म-धर्म, तकनीक, पर्यावरण, परंपरा और विरासत वाक्यांश की कविताओं का आकाश विश्व-विस्तृत है। कवि 'संभोग' पर भी कविता लिखता है जो जीवन की संभावना का पर्याय है उस पर कवि की निगाह बेझिझक कलात्मकता के साथ अभिव्यक्त है। '--हीन नहीं महीन कलाकारी है / ढीले सितार के सुरों को / सुरीली मधुर धुन में साधने जैसी / समर्पण देने और पाने की भावना का / रागात्मक साधना है संभोग।’ स्नान करने की इच्छा है संभोग / अपने वंश वृद्धि की आशा है / जो वंश वृद्धि के विमुख खड़े हैं / उनके लिए एक हवस है वीभत्स।’ 

राजेंद्र की कविताएं लीक से हटकर कविता होने-न होने की फ़कीरी से अलमस्त हैं। उनकी कविताएं वर्णन शैली में है। थोड़ी बहुत अवरोध के बावजूद कविताएं अभिव्यक्त हो जाती हैं।

पुस्तक -- वाक्यांश 

कवि -- राजेंद्र आहुति 

प्रकाशन -- अभिधा प्रकाशन, मुजफ्फरपुर

मूल्य – रुपये 350/-

Last modified onSaturday, 13 August 2016 14:30
back to top

loading...
Bookmaker with best odds http://wbetting.co.uk review site.