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'रोने' का नहीं, 'समझने' का वक्त है...

धर्मेंद्र कुमार... कुल जमा 300 लोग एनडीटीवी से निकाले गए, मल्लिकार्जुन खड़गे नहीं 'खड़के'...; 300 लोग दैनिक जागरण से निकाले गए, खड़गे नहीं खड़के; 250 लोग टाइम्स ऑफ इंडिया से निकाले गए, खड़गे नहीं खड़के...; करीब इतने ही लोग हिंदुस्तान टाइम्स से निकाले गए, खड़गे नहीं खड़के; 700 लोग सहारा इंडिया और अन्य मीडिया संस्थानों से निकाले गए, खड़गे नहीं खड़के...; नरेंद्र मोदी शासन में 5000 से ज्यादा छोटे और मझोले अखबार बंद हो गए और हजारों मीडियाकर्मी बेरोजगार हुए, खड़गे तब भी नहीं खड़के...। अब ऐसा क्या हुआ कि तीन 'खास' मीडियाकर्मियों को जब 'उनके' संस्थानों ने निकाला तो खड़गे न सिर्फ 'खड़के' बल्कि खूब जोर से 'भड़के' भी...???!!!

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पत्रकारिता और राजनीति में ‘एच’ का सिद्धांत

धर्मेंद्र कुमारआज के दौर में, और शायद पहले भी, पत्रकारिता और राजनीति एक दूसरे के साथ समानांतर चलते प्रतीत होते हैं। हालांकि, पत्रकारिता का क्षेत्र राजनीति से कहीं ज्यादा बड़ा है। पत्रकारिता की भाषा में कहें तो राजनीति महज एक ‘बीट’ है लेकिन हमारे देश में चूंकि राजनीति ही सबसे बड़ा ‘रुचि’ का विषय है तो पत्रकारिता में राजनीति ही छायी रहती है।

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