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चुनौतियों से भरे 70 साल; क्या खोया, क्या पाया…!

ब्रिटिश हुकूमत का मतलब क्या था यह उस समय के आंदोलन के इतिहास के एक अंश से समझा जा सकता है। महात्मा गांधी ने ‘यंग इंडिया’ में लिखा“ हमें अनुभव होता हो या न होता हो, कुछ दिन से हम पर एक प्रकार का फौजी शासन हो रहा है। फौजों का शासन आखिर है क्या? यही कि सैनिक अफसर की मर्जी ही कानून बन जाती है और वह चाहे साधारण कानून को ताक पर रखकर विशेष आज्ञाएं लाद देता है और जनता बेचारी में उनके विरोध करने का दम नहीं होता, पर मैं आशा करता हूं, वे दिन जाते रहे कि अंग्रेज शासकों के फरमानों के आगे हम चुपचाप सिर झुका दें...”

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जयप्रकाश नारायण : ‘संघर्ष’ आजादी से ‘पहले’ भी, आजादी के ‘बाद’ भी...

जयप्रकाश नारायण : ‘संघर्ष’ आजादी से ‘पहले’ भी, आजादी के ‘बाद’ भी...जयप्रकाश नारायण आधुनिक भारत के इतिहास में एक अनोखा स्थान रखते हैं क्योंकि वह अकेले ऐसे व्यक्ति हैं जिनको देश के तीन लोकप्रिय आंदोलनों में सक्रिय रूप से भाग लेने का अनोखा गौरव प्राप्त है। उन्होंने न केवल अपने जीवन जोखिम में डालते हुए भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान ब्रिटिश औपनिवेशिक शासकों के खिलाफ लड़ाई लड़ी बल्कि सत्तर के दशक में भ्रष्टाचार और अधिनायकवाद के खिलाफ आंदोलन का नेतृत्व किया और इसके पहले 50 और 60 के दशकों में लगभग 10 वर्ष तक भूदान आन्दोलन में भाग लेकर हृदय परिवर्तन के द्वारा बड़े पैमाने पर सामाजिक परिवर्तन लाने का कार्य भी किया।

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पीढ़ियों को प्रेरणा देती रहेगी पिल्लई की गाथा...

काप्‍पालोत्तिया तमिलन (तमिलों के कर्णधार) और सेक्किजुट्ठा सेम्‍माल (तेल के कोल्‍हू पर यातनाएं झेलने वाले विद्वान) के नाम से विख्‍यात वलिनायगम ओल्‍गानाथन चिदंबरम पिल्लई, असाधारण रूप से प्रतिभाशाली आयोजक एवं प्रचारक थे तथा वह एक ऐसी शख्सियत थे जो राष्‍ट्रवादी ध्‍येय के लिए जनता को उद्देलित करने के लिए सभी उपलब्‍ध संसाधनों का उपयोग करने में विश्‍वास रखते थे।काप्‍पालोत्तिया तमिलन (तमिलों के कर्णधार) और सेक्किजुट्ठा सेम्‍माल (तेल के कोल्‍हू पर यातनाएं झेलने वाले विद्वान) के नाम से विख्‍यात वलिनायगम ओल्‍गानाथन चिदंबरम पिल्लई, असाधारण रूप से प्रतिभाशाली आयोजक एवं प्रचारक थे तथा वह एक ऐसी शख्सियत थे जो राष्‍ट्रवादी ध्‍येय के लिए जनता को उद्देलित करने के लिए सभी उपलब्‍ध संसाधनों का उपयोग करने में विश्‍वास रखते थे। जब तक वीओ चिदम्‍बरम का तूतीकोरिन में आगमन नहीं हुआ, तब तक तिरूनेलवेली में स्‍वदेशी आंदोलन को ताकत और गति न मिल सकी। (Read in English)

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न झुका..., न रुका..., अमर शहीद महाराणा बख्तावर सिंह

अमर शहीद महाराणा बख्तावर सिंहमध्य प्रदेश के धार जिले के अमझेरा कस्बे के अमर शहीद महाराणा बख्तावर सिंह को मालवा क्षेत्र में विशेष रूप से नमन किया जाता है। मालवा की धरती पर प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में अंग्रेजों से मुकाबला करने वाले वह ऐसे नेतृत्वकर्ता थे जिन्होंने अंग्रेजों की सत्ता की नींव को कमजोर कर दिया था। उन्होंने राजशाही में जीने वाले लोगों को भी देश के लिए बलिदान देने की प्रेरणा दी। लंबे संघर्ष के बाद छलपूर्वक अंग्रेजों ने उन्हें कैद कर लिया। 10 फरवरी 1858 में इंदौर के महाराजा यशवंत चिकित्सालय परिसर के एक नीम के पेड़ पर उन्हें फांसी पर लटका दिया। 

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भारतीय गौरव और आत्‍मविश्‍वास के प्रतीक हैं चंद्रशेखर आजाद

विदेशी शासन की क्रूरता पर काबू पाने की आवश्‍यकता के साथ ही साथ हमारे उपमहाद्वीप के गरीब और असंगठित लोगों को इस संघर्ष के लिए तैयार करना भी उस समय के राष्‍ट्रीय नेताओं के समक्ष भयावह चुनौती थी।उपनिवेशी शासन के विरुद्ध भारत का संघर्ष लम्‍बा और कठिन था। विदेशी शासन की क्रूरता पर काबू पाने की आवश्‍यकता के साथ ही साथ हमारे उपमहाद्वीप के गरीब और असंगठित लोगों को इस संघर्ष के लिए तैयार करना भी उस समय के राष्‍ट्रीय नेताओं के समक्ष भयावह चुनौती थी। विदेशी प्रभुत्‍व के खिलाफ हमारे संघर्ष का सबसे महत्‍वपूर्ण पहलु लोगों को अज्ञानता से बाहर निकालने की हमारे नेताओं की योग्‍यता और इसके परिणामस्‍वरूप एक भारतीय राष्‍ट्र के विचार का पुनरुत्‍थान था।

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जज्बा-ए-जुनून का दूसरा नाम रहीं मैडम भीकाजी कामा

मैडम भीकाजी रुस्तम कामा का नारा “आगे बढ़ो, हम भारत के लिए हैं और भारत भारतीयों के लिए है”, आजादी के लिए उनके जज्बे व जुनून को बयां करने के लिए काफी है।मैडम भीकाजी रुस्तम कामा का नारा “आगे बढ़ो, हम भारत के लिए हैं और भारत भारतीयों के लिए है”, आजादी के लिए उनके जज्बे व जुनून को बयां करने के लिए काफी है। 1861 में मुंबई के धनी पारसी परिवार में जन्मी भीकाजी कामा भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की मुख्य केंद्र बिंदु और पहली महिला क्रांतिकारी थी। मैडम कामा स्वतंत्रता की पुजारिन रहीं। 

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गज़ल और गीतों ने भी आजादी दिलाने में निभाई अहम भूमिका

गज़ल और गीतों ने भी आजादी दिलाने में निभाई अहम भूमिकादुनिया में जब भी किसी ऐसे आंदोलन को याद करते हैं जिन आंदोलनों में मनुष्य अपने ऊपर थोपे गए कई बंधनों से मुक्ति के लिए एकजूट होता है तो उस आंदोलन का कोई न कोई गीत याद आने लगता है। यही वास्तविकता है कि कोई भी आंदोलन गीतों के बिना पूरा नहीं होता है। काव्य धारा के कई रूप हैं और वे कविता, नज्म़, गज़ल, गीत आदि के रूप में जाने जाते हैं। बल्कि यूं भी कहा जाए कि नारे भी अपनी काव्यत्मकता से ही यादगार बन पाते हैं। ब्रिटिश सत्ता के खिलाफ आंदोलनों के लिए न मालूम कितने गीत लिखे गए। इस विषय पर कई शोध हुए हैं लेकिन तमाम तरह के शोधों के बावजूद ये लगता है कि वे उस दौरान लिखे गए सभी गीतों को समेट नहीं पाए।

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