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महिला साक्षरता : लंबा सफर अभी बाकी...

महिला साक्षरता : लंबा सफर अभी बाकी...

घरेलू काम काज मे हाथ बंटाकर रोजी-रोटी कमाने वाली 28 साल की पार्वती किताब, अखबार को हसरत से देखती है, पढ़ना उसके लिए सपना है। पार्वती निरक्षर है, अलबत्ता उसके दो भाई कॉलेज मे स्नातकोत्तर शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं। उसकी लगभग 50 साल की मां सावित्री भी निरक्षर है, सावित्री बताती है कि उसकी मां ने भी कभी पढ़ाई नहीं की। मां बताती है कि उसका पति और पार्वती का पति कुछ पढ़े-लिखे जरूर हैं। पिता की पहली वाली पुरुषो की पीढ़ी अनपढ़ ही थी लेकिन अब पार्वती के बेटे के साथ उसकी नौ साल की बेटी एक अच्छे स्कूल मे पढ़ती है। अब पार्वती का सपना है कि बड़ी होकर उसकी बेटी 'बड़े घरों की मेडमों' जैसी नौकरी करे, अपनी गाड़ी खुद चलाए और जब उसका मन हो शादी करे ताकि उस के बच्चे अनपढ मां की संतानें नहीं हों। जब उसे सुझाव दिया जाता है कि 'बच्ची के साथ तुम भी पढ़ो' तो उसके चेहरे पर उदासी तैरने लगती है। मद्धिम सी आवाज मे बुदबुदाती है... "अब कहां पढ़ पाऊंगी?"

दरअसल यह कहानी पार्वती, उस की मां सावित्री और उनके परिवार की पुरानी पीढ़ियों की नहीं है बल्कि यह नाम एक सफर दर्शाते हैं जो आज़ादी के बाद महिला साक्षरता का इतिहास है, यानी आधी आबादी की साक्षरता स्थिति। देश में देश की आजादी के समय राष्ट्रीय स्तर पर महिला साक्षरता दर बेहद कम महज 8.6 प्रतिशत ही थी लेकिन राहत की बात यह है कि 2011 की जनगणना के अनुसार 65.46 दर्ज की गई। लड़कियों के लिए स्कूलों में सकल नामांकन अनुपात (जीईआर) प्राथमिक स्तरपर 24.8 प्रतिशत था जबकि उच्च प्राथमिक स्तर (11-14 वर्ष के आयु वर्ग में) पर यह महज 4.6 प्रतिशत ही था।

निश्चित तौर पर पिछले दशक महिला साक्षरता के लिए अच्छे रहे जिससे न केवल समाज मे उनकी स्थति मजबूत हुई, वे अपने अधिकारों के प्रति सजग भी हुईं बल्कि इससे उनके स्वास्थ्य और जच्चा-बच्चा मृत्यु दर में कमी आई। जनसंख्या सीमित करने में भी मदद मिली लेकिन हालत अब भी संतोषजनक नहीं है, यानी, अभी लंबा सफर बाकी है। पचास के दशक के बाद महिलाओं की शिक्षा पर शनै:-शनै: ध्यान दिया जाने लगा। आंकड़ों के जरिये अगर देखें तो इस यात्रा में महिला साक्षरता दर पुरुष दर 46.32 प्रतिशत के मुकाबले महिलाओं की 49.69 प्रतिशत रही। आजादी के तीन दशक बाद महिला साक्षरता पुरुषों के मुकाबले तेजी से वृद्धि हुई। वर्ष 1971 में यह 22 प्रतिशत थी यानी पिछले समय के मुकाबले वृद्धि दर 11.72 प्रतिशत रही। अच्छी बात यह रही कि वर्ष 2000 से लेकर वर्ष 2005 तक की अवधि के दौरान लड़कियों द्वारा बीच में ही अपनी पढ़ाई छोड़ देने की दर में 16.5 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई वैसे महिला पुरुषों की तुलना के अलावा शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों मे भी महिला साक्षरता मे बड़ा अंतर है।

‘सर्व शिक्षा अभियान’ और ‘महिला साक्षरता के लिए साक्षर भारत मिशन’ जैसे कार्यक्रमों की बदौलत देश में महिला साक्षरता दर जो आजादी के फौरन बाद पहले 10 प्रतिशत से भी कम थी वह आज बढ़कर लगभग 66 प्रतिशत हो गई है। वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार, जहां एक ओर पुरुष साक्षरता दर 82.14 प्रतिशत आंकी गई, वहीं दूसरी ओर महिला साक्षरता दर 65.46 प्रतिशत रही, यानी महिला साक्षरता का सफर अभी काफी लंबा है।

आंकड़ों के अनुसार हमारे देश में वर्ष 1990 में 61.6 फीसदी पुरुष शिक्षित थे तो सिर्फ 33.7 फीसदी महिलाएं ही शिक्षित थीं। उधर, वर्ष 2000 में 74 फीसदी पुरुष शिक्षित थे तो वहीं 47.8 फीसदी महिलाएं ही शिक्षित थीं। इसका मतलब यही है कि देश में साक्षर महिलाओं की संख्या बढ़ रही है लेकिन गरीबी और सामाजिक सोच के चलते अब भी महिला साक्षरता की स्थिति पर सवालिया निशान है। हालांकि, बड़ी संख्या में लोगों की बदलती सोच एवं विभिन्नि सरकारों की सकारात्मक सोच काम आ गई कि ‘एक व्यक्ति को पढ़ाने से केवल एक आदमी पढ़ता है, जबकि एक महिला को पढ़ाने से पूरा परिवार पढ़ता है। यहां तक कि इस पढ़े-लिखे परिवार के आसपास का समाज भी जागृत होता है। यही नहीं, इसका लाभ आगे चलकर राष्ट्र निर्माण में भी मिलता है।’

एक नजर जरा... देश के कुछ राज्यों में महिलाओं की साक्षरता की स्थिति पर। वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार, केरल में सबसे ज्यादा महिला साक्षरता दर 92% है जबकि राजस्थान में महिला साक्षरता दर महज 52.7% है, जो भारत में सबसे कम है। वहीं, दूसरी ओर घनी आबादी वाले राज्यों जैसे उत्तर प्रदेश में महिला साक्षरता दर 59.3% और बिहार में महिला साक्षरता दर 53.3% है। लक्षद्वीप, मिजोरम, त्रिपुरा और गोवा में महिला साक्षरता की स्थिति बड़ी अच्छी है।

एक रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में 82.14 फीसदी पुरुष, 65.46 फीसदी महिलाएं और 81 फीसदी युवा साक्षर हैं लेकिन भारत को इस बात पर ध्यान देना होगा कि भारत में औसत साक्षरता दर विश्व स्तर पर 84 प्रतिशत की औसत साक्षरता दर से लगभग 10 फीसदी कम है। साक्षरता दर 51 विकासशील देशों मे भारत का स्थान 38वां है।

आईना दिखाते कुछ और आंकड़े... गांवों तथा शहरों में साक्षरता का अंतर घटकर 15 प्रतिशत रह गया है जबकि महिला तथा पुरुषों के बीच साक्षरता अंतर 16 प्रतिशत है। इसी तरह, ग्रामीण इलाकों में 71 प्रतिशत साक्षरता है जबकि शहरी इलाकों में 86 प्रतिशत साक्षरता है। सर्वेक्षण के अनुसार देहाती इलाकों के 4.5 प्रतिशत पुरुषों ने स्नातक स्तर की शिक्षा पाई है जबकि सिर्फ 2.2 प्रतिशत महिलाओं ने स्नातक और उससे ज्यादा की शिक्षा हासिल की है। शहरी इलाकों में 17 प्रतिशत पुरुषों और 13 प्रतिशत महिलाओं ने इस तरह की योग्यता हासिल की है। ये आंकड़े शिक्षा पर राष्ट्रीय सैम्पल सर्वे के 71वें दौर के नतीजे हैं जो जून 2014 तक कराया गया। इस तरह का सर्वे राष्ट्रीय सैंपल सर्वे कार्यालय ने पिछली बार जुलाई 2007 से जून 2008 के बीच कराया था। यह सर्वेक्षण 4577 गांवों के 36479 परिवारों तथा 3700 शहरी इलाकों में 29447 परिवारों के बीच किया गया।

एक और ऐसा कटु तथ्य है जिससे भारत में महिला साक्षरता का दूसरा पहलू सामने आता है। विगत दशकों के दौरान भारत में साक्षरता के क्षेत्र में अच्छी प्रगति होने के बावजूद अब भी बड़ी संख्या में महिलाएं अशिक्षित हैं। आंकड़ों से पता चला है कि एक तरफ तो महिलाएं तेजी से सभी क्षेत्रों में तेजी से आगे बढ़ रही हैं, स्कूली शिक्षा मे लगातार रिकार्ड बनाने के बावजूद लगभग 24 करोड़ महिलाएं आज भी पढ़ने-लिखने में सक्षम नहीं हैं। केवल 13.9 फीसदी महिलाएं ही शहरी क्षेत्र में कार्यरत हैं, जबकि 29 फीसदी महिलाएं घरेलू और कृषि क्षेत्रों में कार्यरत हैं। इसका मतलब यही है कि भारत में जहां एक ओर बड़ी संख्या में महिलाएं शिक्षा एवं रोजगार के मोर्चों पर निरंतर कामयाबी की सीढि़या चढ़ रही हैं, वहीं दूसरी ओर करोड़ों महिलाएं बुनियादी शिक्षा से भी वंचित हैं। देश के मानव संसाधन में लगभग 50 फीसदी महिलाएं ही हैं लेकिन इसके बावजूद बुनियादी शिक्षा के अभाव ने उनसे भारत के विकास और प्रगति का हिस्सा बनने का मौका छीन लिया है। यही नहीं, इसका प्रतिकूल असर देश में आर्थिक विकास पर भी पड़ रहा है क्योंकि उसकी रफ्तार अपेक्षा से कम है। इसके अलावा, बड़ी संख्या में महिलाओं की निरक्षरता का असर हमारे समाज पर भी पड़ रहा है।

इस स्थति की ओर भी अक्सर ध्यान जाता है कि देश की आजादी के इतने वर्षों बाद भी बड़ी संख्या में महिलाएं अब भी निरक्षर क्यों हैं?  इसके कई कारण हैं। गरीबी, बालिकाओं और उसकी शिक्षा के प्रति माता-पिता का नकारात्मक रवैया इसके लिए काफी हद तक जिम्मेदार है। ज्यादातर परिवारों में शिक्षा के मामले में लड़कों को प्राथमिकता दी जाती है, गांव-देहातों और समाज के कमजोर तबके की बच्चियां अपने छोटे भाई-बहनों को संभालने के लिए स्कूल नही जाती है क्योंकि उनके मां-बाप मजदूरी के लिए जाते हैं,  दूसरे विशेष तौर पर ग्रामीण क्षेत्रों मे स्कूलों से घर की दूरी बहुत होना, स्कूलों में शौचालय नहीं होने की वजह से बड़ी होती बच्चियों का स्कूल छुड़वा दिया जाता है। एक प्रमुख समस्या स्कूलों मे महिला शिक्षिकाएं नहीं होने की भी है। पूरे देश में 99 फीसदी परिवारों के लिए प्राइमरी स्कूल दो किलोमीटर की दूरी के अंदर मौजूद हैं लेकिन जहां तक सेकंडरी स्कूलों का सवाल है तो देहाती इलाकों में सिर्फ 60 प्रतिशत बच्चों के लिए दो किलोमीटर के अंदर माध्यमिक स्कूलों की सुविधा है। शहरों में 91 प्रतिशत बच्चों को यह सुविधा है। इसके अलावा शहरों में सार्वजनिक परिवहन या स्कूल बसों की भी सुविधा है।

शिक्षा क्षेत्र में सरकारी सेक्टर की प्रमुख भूमिका है। खास तौर पर ग्रामीण क्षेत्रों और समाज के कमजोर तबके लिए यह सेक्टर धुरी है। शिक्षा संस्थानों पर सरकारी निवेश की तस्वीर इन आंकड़ों से भी साफ होती है कि देहाती इलाकों में बहुमत छात्र माध्यमिक और उच्च माध्यमिक स्तर की शिक्षा सरकारी संस्थानों में पा रहे हैं। प्राइमरी स्तर पर 72 प्रतिशत और माध्यमिक स्तर पर 64 प्रतिशत छात्र सरकारी स्कूलों में जा रहे हैं तो शहरों में प्राइमरी स्तर पर सिर्फ 31 प्रतिशत और माध्यमिक स्तर पर 38 प्रतिशत छात्र सरकारी संस्थानों में दाखिल हैं। ज्यादातर देशों में स्कूल, कॉलेज और अन्य शिक्षा संस्थान बनाने और चलाने का खर्च सरकारें उठाती हैं जबकि इन सुविधाओं के इस्तेमाल के लिए लोगों को ट्यूशन फीस, परीक्षा फीस और कागज किताब के खर्च के रूप में खुद भागीदारी करनी होती है। वैसे भारत में पिछले सालों में व्यापक स्तर पर शिक्षा का निजीकरण हुआ है जिसकी वजह से शिक्षा पर होने वाला खर्च भी तेजी से बढ़ा है फिर भी सरकारी क्षेत्र का वर्चस्व बना हुआ है और कुल मिलाकर यह सेक्टर सामाजिक दायित्व की अपनी भूमिका निभाता आ रहा है।

इसके साथ-साथ यह भी जरूरी है कि महिलाएं भी देश में संतुलित और शिक्षित समाज बनाने की खातिर अपने परिवार की बालिकाओं को शिक्षा प्राप्त करने के लिए खुलकर प्रोत्साहित करें क्योंकि जीवन में जब भी कोई गंभीर संकट दस्तक देता है तो महिलाओं द्वारा हासिल की गई शिक्षा ही उन्हें मुश्किलों से सफलतापूर्वक उबारती है और उन्हें गर्व के साथ जीवन जीने में सक्षम बनाती है।

महिला साक्षरता के क्षेत्र मे हुई प्रगति के बावजूद जरूरत इस बात की है कि शिक्षा पर बजट बढ़ाया जाए क्योंकि 'पढ़ेगा इंडिया तभी तो बढ़ेगा इंडिया' तब शायद पार्वती के चेहरे की उदासी भी मुस्कान मे बदल जाएगी और वह किताब को सिर्फ हसरत से देखेगी नहीं, पढ़ेगी भी...

(लेखिका पत्रकार हैं)

Last modified onSaturday, 26 August 2017 20:53
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