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यह कैसा सर्वे…!?

यह कैसा सर्वे…!?

महिलाओं के लिए विश्व के सबसे खतरनाक देशएक फाउंडेशन द्वारा किया गया जनमत सर्वेक्षण-महिलाओं के लिए विश्व के सबसे खतरनाक देश 2018-आंकड़ों पर नहीं बल्कि अज्ञात व्यक्तियों की अवधारणाओं पर आधारित है।

थॉमसन रायटर्स फाउंडेशन ने हाल में एक जनमत सर्वेक्षण किया है जिसका शीर्षक है – ‘महिलाओं के लिए विश्व के सबसे खतरनाक देश – 2018’। फाउंडेशन ने कहा है कि भारत महिलाओं के लिए सबसे खतरनाक देश है। यह घोषणा किसी रिपोर्ट या आंकडों पर नहीं बल्कि एक जनमत सर्वेक्षण पर आधारित है।

इस नतीजे तक पहुंचने के लिए रायटर्स ने जिस प्रक्रिया का उपयोग किया है उसे ‘अवधारणा’ आधारित बताया गया है। यह मात्र छह प्रश्नों के जवाब पर आधारित है। ये परिणाम आंकड़ों के आधार पर नहीं निकाले गए बल्कि पूर्णतया विचारों पर आधारित हैं। इसके अतिरिक्त इस सर्वेक्षण में मात्र 548 लोगों को शामिल किया गया है। रायटर्स के अनुसार ये व्यक्ति महिला संबंधी मामलों के ‘विशेषज्ञ’ हैं। इन व्यक्तियों के पद, संबंधित देश, अकादमिक योग्यता व विशेषज्ञता आदि के संबंध में कोई जानकारी उपलब्ध नहीं है। ये सभी चीजें सर्वेक्षण की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लगाती है। संगठन द्वारा प्रक्रिया संबंधी दी गई जानकारी के अनुसार सर्वेक्षण में शामिल कुछ लोग ‘नीति निर्माता’ हैं।

सर्वेक्षण में पूछे गए छह प्रश्न एक समान रूप से सभी देशों पर लागू किए गए हैं जिसे किसी भी तरह से सही नहीं ठहराया जा सका है। उदाहरण के लिए विभिन्न देशों में बाल विवाह की उम्र सीमा अलग-अलग है। इसके अलावा महिला के जनानंगों की विकृति, दोषी व्यक्ति को पत्थर मारना आदि प्रथाएं भारत में प्रचलित नहीं हैं।

इसके अतिरिक्त उपलब्ध आंकड़ों को साझा करना, नीति निर्माण में सुझाव लेना तथा सरकार की पारदर्शी प्रणालियों के आधार पर भारत में महिलाओं की समस्याओं को रेखांकित किया जाता है। सरकार मीडिया, शोधकर्ताओं तथा स्वयंसेवी संगठनों के साथ खुले रूप से विचारों का आदान-प्रदान करती है। इससे आम लोगों को बहस में जुड़ने का अवसर प्राप्त होता है। आम लोग और स्वतंत्र मीडिया, महिलाओं के खिलाफ होने वाली हिंसा पर खुले रूप से चर्चा कर सकती हैं। ऐसी बहसों को प्रोत्साहित किया जाता है। ऐसी खुली व्यवस्था में महिलाओं से संबंधित मामले भारत में जोर-शोर से उठाए भी जाते हैं। संभवतः इसी कारण ऐसी अवधारणा बनती है कि देश की स्थिति खराब है।

सर्वेक्षण में स्वास्थ्य देखभाल, भेदभाव, सांस्कृतिक परंपराएं, यौन हिंसा, गैर-यौन हिंसा, मानव तस्करी, जैसे विषयों पर 548 व्यक्तियों का जनमत संग्रह किया गया है। इन क्षेत्रों में भारत अन्य देशों की तुलना में बहुत आगे है। इसके अलावा पिछले वर्षों की तुलना में स्थितियां बेहतर हुई हैं। इसलिए भारत की रैकिंग स्पष्ट रूप से गलत है।

उदाहरण के लिए जून 2018 में जारी नमूना पंजीयन सर्वे (एसआरएस) के अनुसार प्रसव के दौरान मातृ मृत्यु दर में 2013 की तुलना में 22 प्रतिशत की कमी आई है। इसके अलावा जन्म के समय लिंग अनुपात भी बेहतर हुआ है। इससे यह भी पता चलता है कि लिंग आधारित गर्भपात की संख्या में भी कमी आई है।

 

आर्थिक क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण प्रगति हुई है। महिलाओं की आजीविका के लिए लगभग 45.6 लाख स्वयं सहायता समूहों को बढ़ावा दिया गया है और इसके लिए दो हजार करोड रुपये की धनराशि उपलब्ध कराई गई है। बालिकाओं के वित्तीय समावेश के लिए सुकन्या समृद्धि योजना के तहत 1.26 करोड़ बैंक खाते खोले गए हैं। कुल जनधन खातों में से आधे महिलाओं के हैं। प्राथमिक और उच्च माध्यमिक स्तर पर लड़के और लड़कियों के नामांकनों की संख्या समान है। इस प्रकार यह कहना गलत है कि भारत ने महिलाओं को आर्थिक संसाधन उपलब्ध नहीं हैं।

बाल विवाह की संख्या में भी महत्वपूर्ण कमी आई है। 0-9 वर्ष की आयु सीमा में बाल विवाह की संख्या शून्य है। 15 से 19 वर्ष की आयु सीमा में लड़कियों के मां बनने या गर्भवती होने की संख्या में भी कमी आई है। यह 2005-06 में 16 प्रतिशत से घटकर 2015-16 में 7.9 प्रतिशत हो गई है।

एनसीआरबी आंकड़ों के अनुसार 2016 में दुष्कर्म के 38,947 मामले दर्ज किए गए हैं। 2014 और 2015 में क्रमशः 36735 और 34651 मामले दर्ज किए गए थे। मामलों की संख्या में वृद्धि, पुलिस तक आसानी से पहुंच बनने का परिणाम है। इसके अतिरिक्त भारत में दुष्कर्म की दर प्रति हजार पर 0.03 है, जबकि यूएस में यह प्रति हजार पर 1.2 है। तेजाब फेंकने के मामले भी गिने चुने हैं। जैसा कि पहले कहा गया है कि दोषियों को पत्थर मारने तथा महिलाओं के जननांगों को विकृत करने की प्रथा भारत में नहीं है। इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि हिंसा के मामले में भारत विश्व का सबसे खतरनाक देश नहीं है।

बंधुआ मजदूरी और जबरन मजदूरी के मामलों में भी कमी आई है। अपराध की रिपोर्ट होने पर सख्ती से कार्रवाई की जाती है। मानव तस्करी (रोकथाम, सुरक्षा और पुर्नवास) अधिनियम, 2018 के अंतर्गत मानव तस्करी की समस्या को काफी हद तक नियंत्रित कर लिया गया है।

भारत को महिलाओं के लिए सबसे खतरनाक देश घोषित करने का प्रयास केवल भारत की छवि को धूमिल करने जैसा है। यह प्रयास महिलाओं के पक्ष में हो रहे वास्तविक प्रगतियों से ध्यान हटाने जैसा है।

साल 2012 के दुर्भाग्य पूर्ण घटना के पश्चात पूरा देश महिलाओं की सुरक्षा के प्रति सजग है तथा उन्हें घर में, अर्थव्यवस्था के क्षेत्र में तथा समाज में बराबरी का हक देने के लिए कृत संकल्प है।

यौन हिंसा से बच्चों का संरक्षण अधिनियम 2012, अपराध कानून संशोधन अधिनियम 2013 तथा अपराध कानून संशोधन अध्यादेश, 2018 के तहत बलात्कार के मामलों में कड़ी सजा का प्रावधान किया गया है। इसकी परिभाषा को विस्तार दिया गया है और इसमें तेजाब से हमला, स्टॉकिंग, यौन उत्पीड़न, महिला के सम्मान को चोट पहुंचाना, 18 साल से कम उम्र के लड़कों से किया गया यौन अपराध आदि को शामिल किया गया है। किशोर न्याय (बच्चों की देखभाल और सुरक्षा) अधिनियम 2015 में भी बच्चों की देखभाल और सुरक्षा की जरूरत को विस्तार दिया गया है और इसमें उन बच्चों को भी शामिल किया गया है जिन पर बाल विवाह का खतरा है। इस अधिनियम में 16 वर्ष या इससे अधिक के किशोरों को व्यस्क के समान माने जाने का प्रावधान है यदि वे बलात्कार और हत्या जैसे गंभीर अपराधों में लिप्त पाए जाते हैं।

राज्य सरकारें पुलिस बल में महिलाओं की संख्या को 33 प्रतिशत तक ले जाने के लिए प्रतिबद्ध हैं। महिलाओं की सहायता के लिए 193 वनस्टॉप केन्द्र तथा 31 राज्यों में हेल्पलाइन की शुरुआत की गई है। इन हेल्पलाइन से महिलाओं को 24 घंटे सहायता व सुझाव प्राप्त होते हैं। इनमें पुलिस सहायता, कानूनी सहायता, कानूनी सलाह, मेडिकल सुविधा, मानसिक सामाजिक परामर्श, अस्थाई निवास आदि शामिल है। पिछले तीन वर्षों में संस्थानों ने 12 लाख महिलाओं को सहायता प्रदान की है। यह अलग बात है कि इन व्यवस्थाओं में और सुधार करने की पूरी गुंजायश है।

तीन तलाक को अपराध घोषित करने वाले विधेयक को मंजूरी दी गई है। यह मुस्लिम महिलाओं को समानता का अवसर उपलब्ध कराएगा। महिला सशक्तिकरण की दिशा में यह एक महत्वपूर्ण कदम है।

महिलाओं को समान अवसर प्रदान करने के तहत मुद्रा योजना के अंतर्गत 7.88 करोड़ महिला उद्यमियों को 2,25,904 करोड रुपये का ऋण दिया गया है। प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना के तहत प्रमाण पत्र प्राप्त करने वालों में 50 प्रतिशत महिलाएं हैं। कार्यबल में महिलाओं की संख्या बढ़ रही है और वे आर्थिक संसाधनों को नियंत्रित कर रही हैं। पांच लाख से अधिक महिलाएं कंपनियों में निदेशक के पद पर कार्यरत हैं।

प्रधानमंत्री आवास योजना (शहरी) के अंतर्गत आवासों का आवंटन महिलाओं या संयुक्तरूप से महिला व पुरुष के नाम पर किया जा रहा है। प्रधानमंत्री आवास योजना ग्रामीण के तहत दो लाख आवासों का आवंटन महिलाओं के नाम पर किया गया है। पैतृक संपत्ति में भी महिलाओं की हिस्सेदारी मिलने को बढ़ावा दिया जा रहा है।

माध्यमिक और उच्च शिक्षा में लड़कियों की शिक्षा पर विशेष ध्यान देते हुए सरकार ने विभिन्न छात्रवृत्ति योजनाओं की शुरुआत की गई है। इसके सुखद परिणाम सामने आए हैं। स्कूल छोड़ने की संख्या में भी कमी आई है। कॉलेजों में शिक्षा प्राप्त करने के संदर्भ में लड़कियों की संख्या में वृद्धि हुई है।

माताओं के स्वास्थ्य की स्थिति में भी सुधार हुआ है। एक महत्वपूर्ण कदम के तहत मातृत्व अवकास को बढ़ाकर छह महीने कर दिया गया है। इससे महिलाओं को नौकरी छोड़ने की नौबत नहीं आएगी और गर्भावस्था के दौरान उनकी आय में भी कमी नहीं होगी। पूरे देश में माताओं को नकद प्रोत्साहन दिया जा रहा है ताकि वे गर्भावस्था का पंजीयन कर सकें, अस्पताल में शिशु का जन्म हो और शिशु के जन्म के पहले और बाद उनकी देखभाल हो।

इन प्रयासों से स्थितियां बेहतर हुई हैं। भारतीय महिलाओं का जीवन बेहतर हुआ है। विश्व के अन्य देशों की तुलना में भारतीय महिलाएं बेहतर स्थिति में हैं। तथ्य स्पष्ट रूप से बताते हैं कि भारत को महिलाओं के लिए सबसे खतरनाक देश कहना वास्तविकता से परे है।

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