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स्वतंत्र भारत के 70 सालों में सतत सामाजिक न्याय की परंपरा...

हमारे देश की 16 फीसदी से ज्यादा आबादी अनुसूचित जातियों के लोगों की है। एक लंबे समय तक सामाजिक बहिष्कार होने के कारण समाज का एक वर्ग व्यक्तिगत वृद्धि एवं विकास के लिए आवश्यक अवसरों से वंचित रहा है। बाबासाहेब अंबेडकर ने इस वर्ग को 'वंचित वर्ग' कहा। इसी पृष्ठभूमि से आने वाले बाबासाहेब इस वर्ग की जरूरतों और चुनौतियों से परिचित थे। अपने सार्वजनिक जीवन में बाबासाहेब ने कई उपलब्धियों की ऊंचाइयों को छुआ। विश्व के कई प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थानों में शिक्षा प्राप्त कर वह समुदाय के हित में कार्य करने के लिए स्वदेश लौटे।

भारतीय संविधान की प्रारूप समिति के अध्यक्ष होने के चलते उन्होंने तथाकथित वंचित वर्गों से आने वाले लोगों को शिक्षा एवं रोजगार में विशेष प्राथमिकता की व्यवस्था सुनिश्चित की। विशिष्ट क्षेत्रों में सकारात्मक कार्रवाई के अलावा उन्होंने संसद और राज्यों की विधानसभाओं में सीटों के आरक्षण के माध्यम से उन्होंने समाज में सामाजिक और राजनीतिक रूप से वंचित वर्गों को राजनीतिक प्रतिनिधित्व भी सुनिश्चित किया। हालांकि संसद के ऊपरी सदन (राज्य सभा) और राज्य विधान परिषदों के लिए नामांकन में ऐसा कोई कदम नहीं उठाया गया था।

दलित प्रतीक

इतिहास आमतौर पर व्यक्तियों और परिस्थितियों के परस्पर संबंधों का उत्पाद होता है। इसी तरह दलित इतिहास भी कई ऐसे नायक और नायिकाओं के उदाहरणों से भरा पड़ा है जिन्होंने खुद के विपरीत सामाजिक परिस्थितियों के बीच तमाम चुनौतियों को मुहं तोड़ जवाब दिया और पूरी ताकत के साथ ऊपर आए। दक्षायनी वेलायुदान भारतीय संविधान सभा की पहली महिला दलित सदस्य थीं। वह देश के संविधान का प्रारूप तैयार करने वालों में वह भी शामिल थीं। बाबू जगजीवन राम आजाद भारत के पहले केंद्रीय मंत्रिमंडल के सदस्य बने। 1971 के युद्ध के दौरान उन्होंने रक्षा मंत्री के पद पर महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसी युद्ध की बदौलत एक नए देश का जन्म हुआ। अमेरिकी राजनयिक और 'द ब्लड टेलीग्राम' के लेखक गेरी बास ने उन्हें सबसे तेजतर्रार रक्षा मंत्री बताया है। इसी तरह ऐसी कई दिग्गज हस्तियां हुई हैं जिन्होंने दलित समुदाय के भविष्य के लिए अपने वर्तमान की कुर्बानी दे दी।

संवैधानिक सुरक्षा उपाय

वैश्विक रूप से, ऐसे कई पुख्ता संवैधानिक उपाय किए गए हैं जो समाज के कमजोर तबकों के लिए न्याय सुनिश्चित करते हैं। अमेरिकी समाज भी विविधताओं से भरा हुआ है। ऐतिहासिक रूप से, अमेरिकी नागरिकों, जो अफ्रीकी-अमेरिकी मूल के हैं, को भी स्थानीय प्रभावशाली व वर्चस्व वाले लोगों द्वारा किए गए दुर्भाग्यपूर्ण भेदभाव का शिकार होना पड़ा। इस बात को ध्यान में रखते हुए अमेरिकी नीति-निर्माताओं ने 'अफरमेटिव एक्शन' और 'पॉजिटिव डिस्क्रीमेशन' के लिए नियम बनाए। महत्वपूर्ण क्षेत्रों में प्रभावी प्रतिनिधित्व और संसाधनों के न्यायसंगत वितरण के लिए इस तरह की प्रावधान किए जाते हैं।

देश के इतिहास में पीछे छूट गए लोगों को मुख्य धारा में शामिल करने व उन्हें सशक्त बनाने के लिए भारतीय संविधान में भी इसी तरह के विशेष प्रावधान किए गए हैं।

अनुच्छेद 17 को सामाजिक सुधार लाने की दिशा में एक अग्रणी प्रयास माना जाता है। इस अनुच्छेद को लागू करके आजाद भारत की सरकार ने सामाजिक भेदभाव को खत्म करने के लिए पूरी ईमानदारी से काम किया। संविधान निर्माताओं ने न सिर्फ सामाजिक भेदभाव को अपराध की श्रेणी में लाया बल्कि इस तरह के भेदभाव के लिए दंड का भी प्रावधान किया।

इसी तरह अनुच्छेद 46 के तहत राज्य को अनुसूचित जातियों व अनुसूचित जनजातियों के हितों को प्रोत्साहन देने और उनके आर्थिक स्तर को ऊपर उठाने के लिए काम करने और उन्हें भेदभाव तथा शोषण से बचाने का अधिकार दिया गया है। इस उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए अनुच्‍छेद 15(4) के माध्यम से राज्यों को सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े नागरिकों एवं अनुसूचित जातियों के लिए विशेष प्रावधान करने के सशक्त बनाया गया है। यह अनुच्छेद राज्यों को शैक्षणिक संस्थानों में अनुसूचित जाति के लोगों के लिए सीटें आरक्षित करने के समर्थ बनाता है।

अनुच्छेद 335 एससी / एसटी के लिए शैक्षणिक संस्थानों में दाखिले को लेकर आवश्यक क्वालीफाइंग मार्क्स में छूट का प्रावधान करने के लिए समर्थ बनाता है। इसी तरह अनुच्छेद 243डी प्रत्येक पंचायत में अनुसूचित जनजातियों और अनुसूचित जातियों के लिए सीटों के आरक्षण का उपबंध करता है।

जहां अनुच्छेद 243टी हर नगरपालिका में अनुसूचित जनजातियों और अनुसूचित जातियों के लिए सीटों के आरक्षण का उपबंध करता है, वहीं अनुच्छेद 330 लोक सभा में अनुसूचित जनजातियों व अनुसूचित जातियों के लिए सीटों का आरक्षण का प्रावधान करता है जबकि अनुच्‍छेद 332 राज्यों की विधान सभाओं में अनुसूचित जनजातियों व अनुसूचित जातियों के लिए सीटों के आरक्षण का उपबंध करता है।

अनुसूचित जाति तथा अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 एक अन्य प्रावधान है जो जातीय हिंसा और भेदभाव से संरक्षण उपलब्ध कराता है। हाल ही के कुछ संशोधनों ने इस अधिनियम को और सशक्त बना दिया है।

(लेखक इंडिया फाउंडेशन के प्रमुख हैं। इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार उनके निजी विचार हैं।)

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