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पहले ‘उम्मीद’, फिर ‘भरोसा’ और अब उसकी ‘पुष्टि’ मे जुटा जनतंत्र

धर्मेंद्र कुमार

यह एक विशुद्ध राजनीतिक और लोकतांत्रिक प्रक्रिया ही थी जिसकी एक बार फिर से शुरुआत पीवी नरसिंह राव और तत्कालीन कांग्रेस सरकार की कार्यप्रणाली को देखकर जनता के जेहन में हुई थी। लोगों ने बीजेपी को अस्पष्ट बहुमत देकर चुना...। पहले 13 दिन और उसके बाद पूरे पांच साल के लिए मिली जुली सरकार...। 

लेकिन, तत्कालीन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और पार्टी नेताओं की अदूरदर्शिता की वजह से अटल बिहारी वाजपेयी जैसे व्यक्तित्व के हाथों में बागडोर होने के बावजूद सत्ता अगली बार कांग्रेस को सौंपी गई। पहले पांच साल के ‘जुझारू’ और अगले पांच साल के ‘दुधारू’ दोहन के बाद मनमोहन सिंह सरकार का पतन सुनिश्चित था। और.., एक बार फिर से बीजेपी को नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में सरकार बनाने के ‘जिम्मा’ सौंपा गया। 

साल 2014 में हुए आम चुनाव में जनता ने मोदी में अपनी ‘उम्मीद’ जताई थी। ढाई साल के बाद पांच महत्वपूर्ण राज्यों में मुख्य चुनाव, कुछ उपचुनाव तथा कई नगर निगमों के चुनावों में अपनी कमान बीजेपी को देकर जनता ने उस उम्मीद को ‘भरोसे’ में बदलने का प्रमाण दिया।

अब अगले ढाई साल में मोदी तथा अन्य बीजेपी सरकार यदि राम मंदिर और समान नागरिक संहिता जैसे मुद्दों वाले अपने ‘मुख्य’ एजेंडे को कायम रखने और उसे पूरा करने में ‘खरे’ उतरे तो यही जनता उस भरोसे की ‘पुष्टि’ भी करेगी। इसके बाद ही देश की दिशा और दशा तय होनी है…।

Last modified onSunday, 26 March 2017 20:41
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