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समानता की ओर अग्रसर आधी आबादी...

समानता की ओर अग्रसर आधी आबादी...  

मंगलयान मिशन और एक साथ लॉन्च किए गए 104 उपग्रहों को लेकर भारतीय महिला वैज्ञानिकों के योगदान की प्रशंसा न केवल भारत द्वारा की जा रही है बल्कि पूरी दुनिया में भारतीय महिला वैज्ञानिकों की सराहना हो रही है। डॉ. केसी थॉमस, एन वलारमती, मिनाल संपथ, अनुराधा टीके, रितू करिधल, मोमिता दत्ता और नंदनी हरिनाथ जैसे वैज्ञानिकों ने हर भारतीय को गौरवान्वित किया है।

इन वैज्ञानिकों की तरह ही अनेक महिलाएं हैं जिन्होंने मिशाल कायम की है। वे विभिन्न क्षेत्रों में उत्कृष्टता और ज्ञान के उदाहरण हैं। लेकिन यह आइने का एक पहलू है। यह पहलू शिक्षित, सफल और सशक्त भारतीय महिलाओं की स्थिति की है। दूसरी ओर महिलाओं की बड़ी आबादी आज भी यौनवाद, भेदभाव और दमन झेल रही है। ऐसी महिलाएं जीवन और समाज में अपने उचित स्थान की मांग करने से काफी दूर हैं। ऐसी महिलाएं भारत के संविधान में दिए गए समानता का अधिकार (अनुच्छेद 14) सहित अपने मौलिक अधिकारों का उपयोग नहीं कर पाती। इस स्थिति में एकमात्र रास्ता दोनों पहलुओं के बीच की खाई को पाटना और संतुलन बनाना है। सौभाग्यवश, हम सही रास्ते पर हैं, लैंगिक समानता के सिद्धांतों पर काम कर रहे हैं। कार्यबल तथा निचले स्तर पर राजनीतिक क्षेत्र में महिलाओं के योगदान और भागीदारी से भारत ने 2016 के वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम की वैश्विक लैंगिक अंतर रिपोर्ट में 21 स्थानों की छलांग लगाई हैं। भारत का स्थान 2016 में 87वां हो गया है जबकि 2015 में भारत 108वें पायदान पर था। शिक्षाप्राप्ति, आर्थिक भागीदारी तथा अवसर, स्वास्थ्य तथा राजनीतिक सशक्तिकरण के कारण यह सुधार हुआ है। विश्व में राजनीतिक सशक्तिकरण के बारे में भारत का स्थान 9वां है। यह बड़ी उपलब्धि होने के साथ-साथ अपने देश द्वारा अपनाए गए लोकतान्त्रिक मॉडल की अंतर्निहित शक्ति का संकेतक करता है।

लेकिन, दो राय नहीं कि लैंगिक समानता के संबंध में लंबा रास्ता तय करना है और इस रास्ते की सबसे बड़ी बाधा यह है कि हमारा समाज महिला को किस रूप में देखता है। हालांकि विभिन्न क्षेत्रों की महिलाओं के अधिकारों की रक्षा के लिए कानूनी और संवैधानिक ढांचा सशक्त बनाने वाले हैं लेकिन इऩ प्रावधानों के बारे में उदार और प्रगतिशील चेतना की भारी कमी है। कानूनी चेतना के बावजूद किसी भी सामान्य पुरुष और महिला के लिए न्याय तक पहुंचना और लंबी लड़ाई लड़ना कोई सहज काम नहीं है।

इसी तरह, लैंगिक असंतुलन तथा लैंगिक भेदभाव के कारण 1961 के बाद से देश की महिला आबादी में कमी आ रही है। यह भारत की विकासगाथा पर एक धब्बा है। इस समस्या के समाधान के लिए यानी महिलाओं की गिरती आबादी की प्रवृति बदलने के लिए प्रधानमंत्री द्वारा 2015 में बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ योजना लॉन्च की गई। महिलाओं की कम होती संख्या कहानी के एक भाग को दिखाती है। यह केवल महिलाओं और लड़कियों की निम्न सामाजिक स्थिति का एक लक्षण है। यह दिखाता है कि किस तरह भारत में पितृसत्ता का ढांचा अनादर, दुर्व्यवहार, असमानता और भेदभाव से एक महिला के जीवन चक्र को संचालित करता है। ऐसा भेदभाव और बुनियादी मानवाधिकारों का उल्लंघन सभी वर्गों तथा आबादी की महिलाओं के साथ किया जाता है।

आज भी महिलाओं को टीवी देखने या रेडियो सुनने से रोकने के उदाहरण मिलते हैं। इस तरह के भेदभाव गंभीर या छोटे हो सकते हैं, अपमानजनक हो सकते हैं लेकिन कोई इसके विरोध की आवश्यकता महसूस नहीं करता। स्त्रीद्वेष तथा महिलाओं तथा लडकियों के प्रति हिंसा तेजी से बढ़ रही है।

इस स्थिति में महिलाओं और लड़कियों के लिए समानता हासिल करने के लिए जागरूकता, सोच में परिवर्तन तथा सामाजिक और व्यवहारिक परिवर्तन की आवश्यक है। इस प्रक्रिया में पुरुषों और लड़कों के साथ भागीदारी आवश्यक हो जाती है। पुरुष और लड़के हमारे समाज को दर्पण दिखाते हैं और यौनवाद, असमानता और लैंगिक भेदभाव के विरुद्ध लड़ाई में बराबर के सहयोगी हैं।

निःसंदेह भारत को लैंगिक समानता की लक्ष्य प्राप्ति तथा लैंगिक भेदभाव मुक्त समाज बनाने की अपनी गति जारी रखनी होगी। ऐसा लैंगिक भेदभाव मुक्त समाज जिसमें सभी संसाधनों और अवसरों के मामले में पुरुष और महिलाओं की समान पहुंच होगी। हर प्रयास, हर अभियान और हर पहल मायने रखती है और प्रत्येक हितधारक को इसमें विश्वास रखना होग।  

(लेखक पत्रकार हैं और वर्मान में एसओएस चिल्ड्रेन विलेजेज ऑफ इंडिया की कम्युनिकेशन प्रमुख हैं। लेख में व्‍यक्‍त विचार उनके निजी विचार हैं।)

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