इतना आसान भी नहीं भारत में कौशल विकास, हैं कई चुनौतियां

  • Written by  केएन पाठक
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भारत में कौशल विकास

भारत को अपनी 60 प्रतिशत जनसंख्या क्रियाशील (कार्य करने वाली) आयु में होने का जनसांख्यिकीय लाभ है। भारत के समक्ष यह युवा शक्ति विकास दर में वृद्धि करने और शेष विश्व को कुशल श्रमशक्ति प्रदान करने का सुअवसर प्रदान करती है। विश्व बैंक की रिपोर्ट के अनुसार यह जनसांख्यिकीय फायदा इसलिए है क्योंकि भारत की क्रियाशील आयु वाली जनशक्ति अगले तीन दशकों, कम से कम 2040 तक, आश्रित जनसंख्या से अधिक बनी रहेगी।

राष्ट्रीय उच्च शिक्षा आयोग ने अपनी रिपोर्ट में प्रस्तुत आकलन में कहा है कि भारत में वर्ष 2020 तक औसत आयु संयुक्त राज्य अमेरिका की 40 वर्ष, यूरोप की 46 वर्ष और जापान की 47 वर्ष के मुकाबले 29 वर्ष होगी। यह आकलन भी किया गया है कि अगले 20 वर्ष के दौरान दुनिया में औद्योगिक क्षेत्र में श्रमिकों की संख्या चार प्रतिशत तक घटने की संभावना है, जबकि भारत में यह 32 प्रतिशत बढ़ जाएगी।

हालांकि हमारा देश एक विरोधाभासी स्थिति से गुज़र रहा है जहां एक ओर पुरुष एवं महिलाएं काम की तलाश में श्रम बाज़ार में सम्मलित हो रहे हैं; वहीं दूसरी ओर उद्योग सही ढंग से प्रशिक्षित श्रम शक्ति की अनुपलब्धता की शिकायत कर रहे हैं। यह विरोधाभास बढ़ती हुई युवा जनसंख्या की नियोजनीयता में वृद्धि और तीव्र एवं समावेशी विकास के लक्ष्य की प्राप्ति हेतु अर्थव्यवस्था को तैयार करने के लिए कौशल विकास के महत्व को दर्शाता है। हालांकि, श्रम बाज़ार की विविधता एवं असंगठित क्षेत्र के महत्व को देखते हुए ऐसा मॉडल तैयार करना चुनौतीपूर्ण है जो पारिस्थितिकी के समस्त महत्वपूर्ण भागीदारों- रोज़गार प्रदाता, प्रशिक्षणकर्ता, प्रशिक्षु एवं सरकार- को लाभ पहुंचा सके।

यह विदित है कि कुल श्रम शक्ति का 93 प्रतिशत असंगठित क्षेत्र में कार्यरत है। लिहाजा कौशल विकास संबंधी कदमों की एक प्रमुख चुनौती इस विशाल जनसंख्या को रोजगारपरक कौशल प्रदान करना है, जिससे वो अपने लिए एक अच्छा कार्य सुरक्षित कर पाए और अपना जीवन स्तर उन्नत बना पाए। 

कौशल विकास एवं उद्यमिता के लिए राष्ट्रीय नीति 2015 ने 2009 में निर्मित नीति का स्थान ले लिया है। मूल रूप से इसका उद्देश्य तेज़ी, गुणवत्ता और निरंतरता के साथ कौशल हासिल करवाने पर है। भारत श्रम रिपोर्ट, 2012 के अनुसार प्रकल्पना की गई है कि प्रतिवर्ष 12.8 मिलियन लोग श्रम बाज़ार में नए आते हैं, इसकी तुलना में हमारे देश में कौशल विकास की मौजूदा क्षमता 3.1 मिलियन है। 

वर्ष 2012 से 2022 की कालावधि में पूरे देश में कौशल विकास के लिए मानव संसाधन आवश्यकता 12.03 करोड़ होने की प्रकल्पना की गई है। इसलिए कौशल विकास संबंधी लक्ष्य की प्राप्ति के लिए अवसंरचना का विस्तार करने की अविलंब आवश्यकता है जो कि वर्तमान क्षमता के चार गुने से भी अधिक है। मध्यावधि रणनीति के लिहाज से वर्ष 2015 से 2022 के मध्य श्रम शक्ति में 104.62 मिलियन नए प्रवेशकों को व्यावहारिक शिक्षा देने की आवश्यकता होगी। वर्तमान में भारत सरकार के 21 मंत्रालय / विभाग कौशल विकास कार्यक्रम में संलग्न हैं। 

भारत के युवाओं को कौशल प्रदान करने की दिशा में अनेक प्रकार की चुनौतियों की पहचान की गई है। उदाहरणार्थ मौजूदा कार्यतंत्र की क्षमता में वृद्धि करना ताकि सभी के लिए न्यायसंगत पहुंच सुनिश्चित हो पाए और साथ ही उसकी गुणवत्ता और प्रासंगिकता भी बरकरार रहे, यह एक बड़ी चुनौती है। इसके लिए प्रशिक्षकों के ज्ञान वर्द्धन के पर्याप्त प्रावधानों के साथ उद्योगों एवं प्रशिक्षण प्रदान करने वाले संस्थानों के मध्य प्रभावी संबंध होने चाहिए। विद्यालयी शिक्षा एवं कौशल विकास के क्षेत्र में किए जा रहे सरकारी प्रयासों के बीच प्रभावी सम्मिलन पर भी और कार्य किया जाना चाहिए। इन सभी को श्रम बाज़ार सूचना तंत्र के आनुरुप्य होना चाहिए। शोध विकास, गुणता आश्वासन, परीक्षा, प्रमाणन, सम्बद्धता एवं प्रत्यायन अन्य चुनौतियां हैं। यह कहने की आवश्यकता नहीं है कि युवाओं को कौशल विकास अपनाने हेतु प्रेरणा देने के लिए इसको आकर्षक एवं उत्पादक बनाने की आवश्यकता है।

इन चुनौतियों से निपटने के लिए सरकार ने कुछ विशेष कदम उठाए भी हैं जिनमें संसृति हासिल करने एवं कौशल विकास को केंद्र सरकार की समस्त योजनाओं का अविभाज्य हिस्सा बनाने के लिए उनका परस्परानुबंधन एवं परिमेयकरण शामिल हैं जिससे यह सुनिश्चित किया जाए कि सभी सरकारी योजनाओं में कार्यक्रम की आवश्यकताओं के लिहाज से एक अवयव कौशल विकास का खयाल रखता है। देश के 21 उच्च विकास क्षेत्रों के लिए एनएसडीसी की ओर से कराए कौशल संबंधी अध्ययन से वर्ष 2022 तक इस क्षेत्र की मानव संसाधन ज़रूरतें पता चलेंगी।  

निगरानी एवं मूल्यांकन किसी भी विकास योजना की रीढ़ होते हैं। चूंकि कौशल विकास एवं उद्यमिता के लिए राष्ट्रीय नीति एक परिणाम आधारित नीति के तौर पर संरचित की गई है, कार्यान्वयन समेत एवं विभिन्न कदमों की प्रगति की समीक्षा और नीति के अंतर्गत सुधारात्मक उपायों के लिए एक नीति कार्यान्वयन एकक (पीआईयू) का गठन किया गया है। योजना में प्रतिपुष्टि के माध्यम से सुधार करने के लिए साझेदारों के मध्य लगातार मंत्रणा का प्रावधान रखा गया है। इस मोर्चे पर इच्छित परिणामों की प्राप्ति सुनिश्चित करने के लिए यह ज़रूरी है कि देखरेख के साथ जल्द से जल्द कार्यक्रम का शीघ्र मूल्यांकन शुरू किया जाए। मूल्यांकन के परिणामों के आधार पर हम प्रभावी कदम उठा कर कार्यान्वयन की प्रक्रिया में आई सभी कमियों को दूर कर पाएंगे।

(लेखक स्वतंत्र अनुसंधानकर्ता हैं एवं सामाजिक-आर्थिक विषयों पर लिखते हैं। यह लेखक के अपने विचार हैं।)

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