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सतत विकास और स्वच्छता की संस्कृति में संतुलन जरूरी

स्वच्छता और शौचालय क्रांति की शुरुआत बेशक महात्मा गांधी जी ने की लेकिन यह दुर्भाग्य रहा कि लंबे अंतराल के बाद भी भारत में स्‍वच्‍छता की संस्‍कृति जन-जन तक पैठ नहीं बना सकी।

स्वच्छता और शौचालय क्रांति की शुरुआत बेशक महात्मा गांधी जी ने की लेकिन यह दुर्भाग्य रहा कि लंबे अंतराल के बाद भी भारत में स्‍वच्‍छता की संस्‍कृति जन-जन तक पैठ नहीं बना सकी। इसलिए आज भी देश को पूरी तरह स्वच्छ और खुले में शौच से मुक्त नहीं किया जा सका है। 

गांधी के बाद किसी सार्वजनिक शख्सियत ने सफाई और शौचालय क्रांति के महत्व को समझा है तो वह शख्सियत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ही हैं जिन्होंने शपथ लेने के बाद लाल किले के अपने पहले ही संबोधन में देश का ध्यान इसकी तरफ आकर्षित किया। इसके साथ ही उन्होंने 2019 तक देश को खुले में शौच से मुक्त करने के लिए युद्ध स्तर पर जुट जाने का संदेश भी दिया। तब से लेकर बेशक सरकारी और गैर सरकारी संस्थाएं इस दिशा में अभियान चला रही हैं पर अब भी देश के करीब 686 जिलों में से सिर्फ 21 जिले, 6846 ब्लॉक में से सिर्फ 287 ब्लॉक और करीब साढ़े छह लाख गांवों में से सिर्फ 80 हजार गांव ही खुले में शौच से मुक्त हो पाए हैं। जाहिर है कि इस दिशा में अब भी काफी और युद्ध स्तर पर प्रयास किए जाने की जरूरत है। अगर ऐसा नहीं हुआ तो 2019 तक देश को खुले में शौच से मुक्त बनाने का प्रधानमंत्री का सपना धरा ही रह जाएगा।

इक्कीसवीं सदी में दुनिया पहुंच गई है, आज दुनिया ने तकनीकी और आर्थिक स्तर पर बड़ी-बड़ी क्रांतियां भी कर ली है लेकिन कड़वी हकीकत यही है कि अब भी दुनिया की करीब सात अरब आबादी में से करीब ढाई अरब आबादी को स्वच्छता, शौचालय और सफाई की सहूलियत हासिल नहीं है। इसमें से भी करीब 40 फीसदी यानी एक अरब ऐसे लोग हैं, जो 18 साल या उससे कम की उम्र के हैं। इन आंकड़ों को ध्यान में रखते हुए हमें इस तथ्य पर भी ध्यान देना होगा कि सफाई की संस्कृति बचपन से ही दी जानी चाहिए। तभी स्वच्छता और सफाई की अहमियत को स्वास्थ्य के नजरिए से सही परिप्रेक्ष्य में समझा जा सकता है। जहां तक सफाई और शौचालय क्रांति की बात है तो सुलभ इंटरनेशनल और इसके संस्थापक डॉक्टर बिंदेश्वर पाठक करीब पांच दशकों से इस दिशा में कार्यरत हैं। गांधी की राह पर चलते हुए डॉक्टर पाठक ने गांधी शताब्दी वर्ष यानी 1969 से सिर पर मैला ढोने की कुप्रथा के विरोध में ना सिर्फ काम कर रहे हैं, बल्कि सुलभ नाम से सस्ती शौचालय तकनीक भी विकसित की है। सुलभ नाम से देश ही नहीं, विदेशों तक में शौचालयों का जाल बिछ चुका है। सुलभ ने अब तक करीब साढ़े आठ हजार सार्वजनिक और करीब डेढ़ लाख घरेलू शौचालय बनाए हैं। दो हौज वाले शौचालय की सस्ती तकनीक के जरिए विकसित सुलभ के शौचालयों का रोजाना करीब पंद्रह लाख लोग इस्तेमाल कर रहे हैं। प्रधानमंत्री की योजना के बाद स्कूलों में हजारो शौचालयों का निर्माण अब तक सुलभ कर चुका है। 

बहरहाल सुलभ ने स्वच्छता और सफाई की संस्कृति को बचपन से ही प्रेरित करने की दिशा में स्कूलों में सुलभ सैनिटेशन क्लब की स्थापना की। इसका मकसद स्कूली जीवन से ही छात्रों में स्वच्छता को लेकर जागरूकता बढ़ाना है। इसी 21 सितंबर को दिल्ली में आयोजित इस क्लब के विशेष कार्यक्रम में अपने देश के स्कूलों के अलावा भूटान, नेपाल, बांग्लादेश, श्रीलंका, वियतनाम और दक्षिण अफ्रीका तक के करीब 800 स्कूली बच्चों ने हिस्सा लिया। भारत में शुरू हुए इस क्लब का विस्तार अब दक्षिण एशियाई देशों मसलन श्रीलंका, बांग्लादेश, भूटान और नेपाल के अलावा पूर्वी एशिया के वियतनाम और अफ्रीकी महाद्वीप के देश दक्षिण अफ्रीका तक पहुंच गया है। ये क्लब सुलभ के संस्थापक डॉक्टर पाठक की उस सोच के मुताबिक काम कर रहे हैं, जिनका मानना है कि स्वच्छता और शौचालय हर व्यक्ति का मूल अधिकार है। बहरहाल सुलभ की प्रेरणा से देश के 12 राज्यों के 174 स्कूलों में सुलभ सैनिटेशन क्लब काम कर रहा है जबकि नेपाल में छह क्लब स्वच्छता की दिशा में काम कर रहे हैं। इसी तरह भूटान में भी कुछ क्लब काम कर रहे हैं। इन क्लबों के जरिए बच्चे अपने साथियों को स्वच्छता की दिशा में प्रशिक्षित कर रहे हैं। इन क्लबों के जरिए बच्चों के बीच माई वाश इन स्कूल और मेंस्ट्रूअल हाइजीन मैनेजमेंट कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं। माई वाश इन स्कूल के जरिए जहां बच्चों को स्कूल में अपनी और अपने वातावरण की साफ-सफाई के लिए प्रशिक्षित किया जा रहा है, वहीं लड़कियों को मासिक धर्म के दौरान साफ-सफाई का प्रबंधन सिखाया जा रहा है। 2004 से लेकर अब तक इस क्लब के जरिए देश के 200 स्कूलों के करीब साढ़े छह हजार बच्चों को माई वाश इन स्कूल और मेंस्ट्रअल हाइजीन मैनेजमेंट के तहत प्रशिक्षित किया जा चुका है।

मौजूदा स्वच्छता कार्यक्रम की कामयाबी तब और बढ़ जाएगी, जब उसे सतत विकास की प्रक्रिया से जोड़ा जा सके। औद्योगीकरण के जरिए हो रहे कार्बन उत्सर्जन से हाल के दिनों में पर्यावरण और प्रकृति को काफी नुकसान पहुंचाया है। इसलिए आज ना सिर्फ औद्योगीकरण, बल्कि खेती और सामान्य विकास में भी प्रकृति के अनुकूल कदमों की तरफदारी की जा रही है। दूसरे शब्दों में कहें तो सतत विकास का मॉडल ही आज धरती को बचाने के लिए हर तरफ स्वीकार किया जा रहा है। मौजूदा स्वच्छता कार्यक्रम की भी यह बड़ी जरूरत है। यहां यह याद दिलाना जरूरी है कि हमारी संस्कृति में भी स्वच्छता की जो अवधारणा रही है, उसमें भी प्रकृति का संरक्षण और सहयोग पर जोर रहा है। सुलभ संगठन की शौचालय क्रांति का भी बुनियादी आधार प्रकृति की रक्षा है। कहना न होगा सुलभ के शौचालयों के साथ ही सुलभ सैनिटेशन क्लब जैसे तमाम उपक्रमों में इस तथ्य पर खासा ध्यान दिया गया है।

अगर 2019 तक पूर्ण स्वच्छता का लक्ष्य हासिल करने का प्रधानमंत्री ने जो सपना देखा है, उसके लिए पूरे देश को एक साथ जागरूक होना होगा और आगे आना होगा। तभी भारत भी यूरोप और अमेरिका के देशों की तरह चमक उठेगा।

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)

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