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पत्रकारिता और राजनीति में ‘एच’ का सिद्धांत

धर्मेंद्र कुमारआज के दौर में, और शायद पहले भी, पत्रकारिता और राजनीति एक दूसरे के साथ समानांतर चलते प्रतीत होते हैं। हालांकि, पत्रकारिता का क्षेत्र राजनीति से कहीं ज्यादा बड़ा है। पत्रकारिता की भाषा में कहें तो राजनीति महज एक ‘बीट’ है लेकिन हमारे देश में चूंकि राजनीति ही सबसे बड़ा ‘रुचि’ का विषय है तो पत्रकारिता में राजनीति ही छायी रहती है।

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महिला साक्षरता : लंबा सफर अभी बाकी...

घरेलू काम काज मे हाथ बंटाकर रोजी-रोटी कमाने वाली 28 साल की पार्वती किताब, अखबार को हसरत से देखती है, पढ़ना उसके लिए सपना है। पार्वती निरक्षर है, अलबत्ता उसके दो भाई कॉलेज मे स्नातकोत्तर शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं। उसकी लगभग 50 साल की मां सावित्री भी निरक्षर है, सावित्री बताती है कि उसकी मां ने भी कभी पढ़ाई नहीं की। मां बताती है कि उसका पति और पार्वती का पति कुछ पढ़े-लिखे जरूर हैं। पिता की पहली वाली पुरुषो की पीढ़ी अनपढ़ ही थी लेकिन अब पार्वती के बेटे के साथ उसकी नौ साल की बेटी एक अच्छे स्कूल मे पढ़ती है। अब पार्वती का सपना है कि बड़ी होकर उसकी बेटी 'बड़े घरों की मेडमों' जैसी नौकरी करे, अपनी गाड़ी खुद चलाए और जब उसका मन हो शादी करे ताकि उस के बच्चे अनपढ मां की संतानें नहीं हों। जब उसे सुझाव दिया जाता है कि 'बच्ची के साथ तुम भी पढ़ो' तो उसके चेहरे पर उदासी तैरने लगती है। मद्धिम सी आवाज मे बुदबुदाती है... "अब कहां पढ़ पाऊंगी?"

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चुनौतियों से भरे 70 साल; क्या खोया, क्या पाया…!

ब्रिटिश हुकूमत का मतलब क्या था यह उस समय के आंदोलन के इतिहास के एक अंश से समझा जा सकता है। महात्मा गांधी ने ‘यंग इंडिया’ में लिखा“ हमें अनुभव होता हो या न होता हो, कुछ दिन से हम पर एक प्रकार का फौजी शासन हो रहा है। फौजों का शासन आखिर है क्या? यही कि सैनिक अफसर की मर्जी ही कानून बन जाती है और वह चाहे साधारण कानून को ताक पर रखकर विशेष आज्ञाएं लाद देता है और जनता बेचारी में उनके विरोध करने का दम नहीं होता, पर मैं आशा करता हूं, वे दिन जाते रहे कि अंग्रेज शासकों के फरमानों के आगे हम चुपचाप सिर झुका दें...”

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स्वतंत्र भारत के 70 सालों में सतत सामाजिक न्याय की परंपरा...

हमारे देश की 16 फीसदी से ज्यादा आबादी अनुसूचित जातियों के लोगों की है। एक लंबे समय तक सामाजिक बहिष्कार होने के कारण समाज का एक वर्ग व्यक्तिगत वृद्धि एवं विकास के लिए आवश्यक अवसरों से वंचित रहा है। बाबासाहेब अंबेडकर ने इस वर्ग को 'वंचित वर्ग' कहा। इसी पृष्ठभूमि से आने वाले बाबासाहेब इस वर्ग की जरूरतों और चुनौतियों से परिचित थे। अपने सार्वजनिक जीवन में बाबासाहेब ने कई उपलब्धियों की ऊंचाइयों को छुआ। विश्व के कई प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थानों में शिक्षा प्राप्त कर वह समुदाय के हित में कार्य करने के लिए स्वदेश लौटे।

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