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विवादों के बावजूद राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों की गरिमा बरकरार

राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार इस देश का सबसे सम्मानित राष्ट्रीय पुरस्कार है जिसे पाने की तमन्ना भारतीय सिनेमा के बड़े फिल्म सितारों से लेकर एक संघर्षरत फिल्मकार, अभिनेता या तकनीशियन तक करता है। खास बात यह है कि जहां निजी क्षेत्र के दूसरे अन्य कई फिल्म पुरस्कारों ने अपनी गरिमा और विश्वसनीयता पूरी तरह से खो दी है, राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों ने अपनी गरिमा और विश्वसनीयता बरक़रार रखी है।

राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार इस देश का सबसे सम्मानित राष्ट्रीय पुरस्कार है जिसे पाने की तमन्ना भारतीय सिनेमा के बड़े फिल्म सितारों से लेकर एक संघर्षरत फिल्मकार, अभिनेता या तकनीशियन तक करता है। खास बात यह है कि जहां निजी क्षेत्र के दूसरे अन्य कई फिल्म पुरस्कारों ने अपनी गरिमा और विश्वसनीयता पूरी तरह से खो दी है, राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों ने अपनी गरिमा और विश्वसनीयता बरक़रार रखी है। 

3 मई को दिल्ली के विज्ञान भवन में राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार समारोह के दौरान अपने संभाषण में राष्ट्रपति प्रणब मुख़र्जी ने एक बहुत महत्वपूर्ण बात कही। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार भारत के उस दर्शन का ही प्रतिनिधित्व करता है जो भाषा, रीति रिवाज, धर्म एवं संस्कृति की विविधता का जश्न मनाता है जबकि भारतीय सिनेमा और इसकी विविधिता, भाईचारे, सहिष्णुता, स्वीकृति एवं सह अस्तित्व की अंतर्निहित भावना को प्रदर्शित करती है।

जिन लोगों ने इस भव्य कार्यक्रम को विज्ञान भवन में उपस्थित होकर या टीवी पर देखा है वे राष्ट्रपति की कही बातों को गहराई से समझ सकते हैं। यह एक ऐसा आयोजन है जहां देश के हर कोने और हर प्रान्त से आए हुए फिल्मकार एक मंच पर इकठ्ठा होते हैं। यह एक ऐसा समारोह है जहां अगर आपको हिंदी सिनेमा के एक सुपर स्टार अक्षय कुमार को श्रेष्ठ अभिनेता के तौर पर सम्मानित किया जाता है तो वहीं दूसरी ओर ‘मदीपु’ नाम की एक छोटी फिल्म को सर्वश्रेष्ठ तुलु फिल्म के पुरस्कार से पुरस्कृत किया जाता है। खास बात यह है कि दोनों ही मामलों में सम्मान एक जैसा मिलता है!

10 अक्टूबर 1954 को जब कि पहला राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार प्रदान किया गया, से लेकर 3 मई 2017 को संपन्न 64वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार तक, इस पुरस्कार ने भारत जैसे 125 करोड़ की आबादी वाले देश के अकेले सबसे बड़े और सबसे सम्मानित फिल्म पुरस्कार के तौर पर अपनी मजबूत उपस्थिति कायम रखी है।

तो इसके पीछे के कारक कौन-कौन से हैं? क्यों है इन पुरस्कारों का ऐसा सम्मान?

मेरे हिसाब से इसकी सबसे बड़ी वजह इन पुरस्कारों की विश्वसनीयता है। सिनेमा के विविध क्षेत्रों के अनुभवी लोगों को ज्यूरी में शामिल करना और पुरस्कारों के चयन में इन सदस्यों की निष्पक्षता ही सबसे बड़े कारण हैं जिसकी वजह से बेहतरीन फिल्मों का चुनाव किया जाता है और सिनेमा के लगभग हर विधा के श्रेष्ठ काम को पहचान कर उन्हें विभिन्न पुरस्कारों से नवाजा जाता है।

निश्चित तौर पर, फीचर या गैर फीचर (डाक्यूमेंट्री) फ़िल्में चुनने या फिर सिनेमा पर सर्वोत्तम लेखन के पुरस्कारों के चयन के लिए जिन लोगों का चयन किया जाता रहा है, वे अपने क्षेत्र के अनुभवी और विश्वसनीय लोग होते हैं। ऐसे लोगों के चुनाव में फिल्म समारोह निदेशालय बहुत ही सावधानी रखता है। इसी का नतीजा है कि चयनित पुरस्कारों पर बिरले ही सवाल उठते हैं।

हालांकि ऐसा नहीं कि राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार विवादों से अछूते रहे हैं। कभी श्रेष्ठ कलाकार के चयन को लेकर तो कभी कथित तौर पर किसी ख़ास क्षेत्र की फिल्म को बढ़ावा देने को लेकर आरोप लगाए जाते हैं जो कुछ समय के लिए विवाद को जन्म देते हैं। एकाध मामले कोर्ट तक पहुंच चुके हैं लेकिन इन पुरस्कारों की गरिमा और इनके महत्व में जरा भी कमी नहीं आई है। कहना न होगा कि कई बार इन पुरस्कारों पर उठे विवाद भी अप्रत्यक्ष तौर पर इन पुरस्कारों के महत्व को ही दर्शाता है जिन्हें मिला, वे खुश। जिन्हें नहीं मिला, वे नाखुश। यह तो संसार का नियम है।

अगर एक ऐसे पत्रकार के तौर पर बात करूं जिसने कई साल तक सिनेमा पर लिखा है और देश / दुनिया के कई फिल्म समारोहों में हिस्सा लिया है, तो मुझे लगता है कि राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों का असली महत्व उन फिल्मकारों के लिए है जो महत्वपूर्ण मुद्दों पर छोटी लेकिन सार्थक वैसी फ़िल्में बनाते हैं जिनपर आम लोगों कि दृष्टि नहीं जाती। उन्हें या उनकी फिल्मों को वो पहचान नहीं मिलती, जिनके वे हक़दार हैं।

3 मई को घोषित वर्ष 2016 के पुरस्कारों की बात करें तो यह राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों का ही कमाल है कि मराठी फिल्म ‘कासव’ सर्वश्रेष्ठ फीचर फिल्म का पुरस्कार पाती है और दीप चौधरी नाम के एक फिल्मकार को उनकी फिल्म ‘अलीफा’ के लिए निर्देशक की पहली फिल्म के लिए इंदिरा गांधी पुरस्कार मिलता है, या फिर, ‘फायर फ्लाइज इन द एबेस’ को सर्वश्रेष्ठ गैर फीचर फिल्म का पुरस्कार दिया जाता है।

यहां यह नहीं देखा जाता कि फिल्म में कौन स्टार है या फिल्म में मनोरंजन करने की कितनी क्षमता है या इसे किसने बनाया है? किसी छोटी से छोटी फिल्म को भी सबसे बड़ा पुरस्कार मिल सकता है। इन्ही पुरस्कारों की ही ताकत है कि मणिपुर, शिलॉन्ग, गुवाहाटी या फिर बिहार, महाराष्ट्र और यूपी के किसी छोटे कस्बे या गांव  की अनजान लेकिन महत्वपूर्ण कहानी अचानक राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार पाने से लोगों की नजरो में चढ़ जाती है। ऐसी फिल्मों का फिल्मकार, भले ही थोड़े समय के लिए, अपने किए के महत्व को समझने लगता है।

एक और बात महत्वपूर्ण है। मुख्यधारा की फिल्मों, खास कर हिंदी सिनेमा और इनके फिल्मकारों के लिए कई  अन्य फिल्म पुरस्कार हैं (भले ही, जैसा कि पहले लिखा गया है, उनकी विश्वसनीयता दांव पर रहती है) और ऐसी फिल्मों और फिल्मकारों पर मुख्यधारा की मीडिया का भी ध्यान रहता है जबकि राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार, क्षेत्रीय सिनेमा को मुख्यधारा में लाने में सबसे बड़ी मदद करता है। मलयाली भाषा की ‘महेशिनते प्रतिकारम’ हो या मराठी भाषा की ‘दशक्रिया’ हो, ऐसी फ़िल्में इस पुरस्कार के मिलने के बाद से अचानक राष्ट्रीय पटल पर आ जाती हैं और इसका इन फिल्मों को सबसे बड़ा फायदा मिलता है। ऐसा पहले भी कई बार होता आया है। हाल के वर्षों में मराठी फिल्म ‘कोर्ट’ इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। इस छोटे बजट के फिल्म को दो साल पहले जब राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला तो लोगों का ध्यान इस फिल्म की ओर गया और बाद में इस फिल्म ने दुनिया के कई फिल्म समारोहों में कई पुरस्कार जीते। 

हर साल की तरह इस साल भी ज्यूरी के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि सैकड़ों प्रविष्टियों के बीच पुरस्कार के लिए किन फिल्मों का चुनाव करें या किसे न करें। तीन मई को विज्ञान भवन के समारोह में और उसके पहले बीते अप्रैल महीने में इन पुरस्कारों की घोषणा करते हुए प्रेस कांफ्रेंस में फीचर और गैर फीचर फिल्म की ज्यूरी के प्रमुखों प्रियदर्शन और राजू मिश्र ने एक ही बात कही। उन्होंने कहा कि जितना वे उनके लिए खुश हैं जिन्हें पुरस्कार मिला, उतना ही वे उनके लिए दुखी हैं जिन्हें नहीं मिला। इतनी कड़ी प्रतिस्पर्धा होती है कि कई बेहतर फिल्मों को ख़ारिज करना पड़ता है क्योंकि उनसे बेहतर फ़िल्में प्रतिस्पर्धा में होती हैं।

इस साल भी फीचर और गैर फीचर फिल्मों के पुरस्कारों के लिए लगभग 600 फ़िल्में पुरस्कारों की दौड़ में शामिल थीं। गैर फीचर श्रेणी में ही 260 से अधिक फ़िल्में मैदान में थीं जिनमें से 23-24 फिल्मों को ही पुरस्कृत किया गया। इनमें से ‘आबा’, ‘सिनेमा ट्रेवलर्स’, ‘प्लेसबो’, ‘द टाइगर हू क्रॉस्ड द लाइन’, ‘जिक्र उस परिवेश का : बेगम अख्तर’ जैसे कई उल्लेखनीय फ़िल्में शामिल हैं जो विभिन्न विषयों और मुद्दों को प्रभावी ढंग से उठाती हैं।

कई बार ये पुरस्कार महत्पूर्ण सामाजिक मुद्दों पर लोगों का ध्यान खींचने में मदद करती हैं। पत्रकारिता से फिल्म निर्माण की ओर कदम बढाने के बाद बनी मेरी अमिताभ पाराशर पहली डाक्यूमेंट्री ‘द आईज ऑफ़ डार्कनेस’ को राष्ट्रपति ने विशेष उल्लेख के राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार से सम्मानित किया। 54 मिनट की इस फिल्म की कहानी यह कहती है कि बिहार में 1980-81 के दौरान हुए ‘आँखफोड़वा कांड’ (जिसमें भागलपुर जिले के पुलिस वालों ने जिले में अपराध को खत्म करने के नाम पर 33 लोगों की आंखों में तेज़ाब डाल कर उन्हें अंधा कर दिया था) के बाद बिहार में आंख फोड़ने की वीभत्स घटनाएं कभी रुकी ही नहीं और उसके बाद आम लोग ही आम लोगों की आंखें मामूली विवादों या चोरी आदि के छोटे-मोटे आरोप लगाकर फोड़ने लगे। दुखद यह है कि यह आज तक जारी है। ‘द आईज ऑफ़ डार्कनेस’ बिहार के अररिया जिले में रहने वाले मुन्ना ठाकुर नाम के एक व्यक्ति के इर्द-गिर्द घूमती है जिसकी आंखें 2013 में उसी के गांव के लोगों ने एक विवाद में फोड़ दी थीं।

तो, राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिलने से इस फिल्म के प्रति भी लोगों की दिलचस्पी बढ़ी है और एक नए फिल्मकार के तौर पर मैं भी भविष्य में और बेहतर काम करने के लिए प्रेरित हुआ हूं।

भारतीय सिनेमा के जनक दादा साहेब फाल्के (1870 -1944) के नाम पर दिए जाने वाले दादा साहेब फाल्के पुरस्कार के इस बार के विजेता के. विश्वनाथ के नाम की जब घोषणा हुई तो विज्ञान भवन में उपस्थित लोगों ने खड़े होकर देर तक तालियां बजाई। ‘शंकराभरणम’, ‘स्वाथि मुथ्यम’ जैसी फिल्मों से उन्होंने देश और विदेश के दर्शकों का मन जीता। उन्होंने कई लोकप्रिय और सफल फ़िल्में बनाई लेकिन उनकी फिल्मों की बड़ी खासियत यह रही है कि वे सामजिक मुद्दों, पारिवारिक मूल्यों, परम्पराओं और देश की संस्कृति को मानवीयता से जोड़ पाए और दर्शकों के दिलों तक पहुंच पाए। हिंदी में बनी उनकी फिल्म ‘सरगम’ एक अत्यंत लोकप्रिय और सफल फिल्म थी। अपने फ़िल्मी करियर को एक साउंड डिज़ाइनर के तौर पर शुरू करने वाले के. विश्वनाथ पांच बार राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों से नवाजे गए हैं। उन्हें पद्मश्री से भी समानित किया जा चुका है।

सूचना व प्रसारण मंत्रालय और फिल्म समारोह निदेशालय हर साल राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों के साथ फिल्म के क्षेत्र में उत्कृष्ट योगदान के लिए दादा साहेब फाल्के विजेता का चुनाव भी करती है। इस सम्मान से सबसे पहले देविका रानी को 1969 में सम्मानित किया गया था 

(लेखक पत्रकार हैं और साथ ही वृत्तचित्र निर्माता भी हैं।)

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