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जारी है राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों की गौरवशाली परंपरा...

देश में यूं तो बरसों से कई फिल्म पुरस्कार समारोह होते रहे हैं, उनमें कुछ में बड़े-बड़े सितारों की मौजूदगी और उनके द्वारा प्रस्तुत देर रात तक चलने वाले रंगारंग कार्यक्रम ऐसे समारोह को कुछ लोकप्रिय भी करते हैं, लेकिन, जो प्रतिष्ठा व महत्व राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों का है वह अद्धभुत है। सच कहा जाए तो राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार देश के सर्वाधिक प्रतिष्ठित फिल्म पुरस्कार हैं और बरसों से चली आ रही इस परंपरा का आज भी कोई सानी नहीं है।

देश में यूं तो बरसों से कई फिल्म पुरस्कार समारोह होते रहे हैं, उनमें कुछ में बड़े-बड़े सितारों की मौजूदगी और उनके द्वारा प्रस्तुत देर रात तक चलने वाले रंगारंग कार्यक्रम ऐसे समारोह को कुछ लोकप्रिय भी करते हैं, लेकिन, जो प्रतिष्ठा व महत्व राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों का है वह अद्धभुत है। सच कहा जाए तो राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार देश के सर्वाधिक प्रतिष्ठित फिल्म पुरस्कार हैं और बरसों से चली आ रही इस परंपरा का आज भी कोई सानी नहीं है।

देश में राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों की शुरुआत साल 1954 में हुई थी। उस समय देश के राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद थे और सूचना प्रसारण मंत्री बीवी केसकर। दिलचस्प बात यह है कि तब पहला पुरस्कार समारोह दो दिवसीय था। इसके लिए पहले दिन 10 अक्टूबर को दिल्ली के नेशनल फिजिकल लेबोरेटरी सभागार में समारोह आयोजित हुआ जिसमे पहले सूचना प्रसारण मंत्री ने फिल्म पुरस्कारों की स्थापना और उद्देश्य की जानकारी देने के साथ जिन फिल्मों को पुरस्कार दिए गए उनके बारे में बताया। बाद में राष्ट्रपति ने विजेताओं को पुरस्कार प्रदान किए। इस समारोह का दूसरा चरण अगले दिन 11 अक्टूबर को हुआ जिसमें सुबह फिल्म प्रभाग में पुरस्कृत फिल्मों का प्रदर्शन हुआ और उसके बाद शाम को राष्ट्रपति भवन में सभी के लिए स्वागत और जलपान समारोह हुआ।

यहां यह भी बता दें कि इन राष्ट्रीय पुरस्कारों को तब राजकीय फिल्म पुरस्कार कहा जाता था। इस प्रथम फिल्म समारोह में सर्वश्रेष्ठ फिल्म का प्रथम स्वर्ण पदक मराठी फिल्म ‘श्यामची आई’ को मिला था और सर्वश्रेष्ठ वृत्तचित्र का स्वर्ण पदक ‘महाबलीपुरम’ को। इन फिल्मों के अलावा प्रथम समारोह में हिंदी फिल्म ‘दो बीघा ज़मीन’ के साथ बांग्ला फीचर फिल ‘भगवान श्रीकृष्ण चैतन्य’ और बच्चों की फिल्म ‘खेला घर’ को और दो वृत्तचित्र ‘होली हिमालयाज’ और ‘ट्री ऑफ़ वेल्थ’ को भी योग्यता प्रमाण पत्र देकर सम्मानित किया गया।

साल 1954 से आरम्भ हुए राजकीय फिल्म पुरस्कारों का नाम कुछ समय बाद राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार कर दिया गया लेकिन तब से अब तक इन पुरस्कारों के प्रदान करने की गौरवमय यात्रा नियमित जारी है। हालांकि, इस दौरान इन वार्षिक पुरस्कार समारोह का स्थान बदलता रहा और तिथि भी लेकिन समारोह की गरिमा और प्रतिष्ठा कभी नहीं बदली। पहले यह पुरस्कार नेशनल फिजिकल लेबोरेटरी सभागार में हुए तो फिर विज्ञान भवन के निर्माण के बाद विज्ञान भवन में होने लगे। बीच में कुछेक बार इनका आयोजन दिल्ली से बाहर भी हुआ और कुछ बरस दिल्ली के सिरीफोर्ट सभागार में भी। लेकिन, अब पिछले कुछ बरसों से यह नियमित रूप से विज्ञान भवन में ही आयोजित हो रहे हैं।

इधर, इन पुरस्कारों को लेकर एक अच्छी बात यह हुई कि पुरस्कारों की तिथि निश्चित कर दी गई। असल में भारत की पहली फिल्म ‘राजा हरिश्चंद्र’ 3 मई 1913 को प्रदर्शित हुई थी, इसलिए जब 2013 में देश में सिनेमा के 100 साल मनाने का समारोह हुआ तो उससे एक वर्ष पहले ही राष्ट्रीय पुरस्कार समारोह आयोजित करने की तिथि भी 3 मई करने का निर्णय लिया गया। इसलिए साल 2012 के 59वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार से यह समारोह प्रति वर्ष 3 मई को और नई दिल्ली के विज्ञान भवन में ही आयोजित हो रहा है।

इस वर्ष भारतीय फिल्मों के शिखर पुरस्कार दादा साहब फाल्के से सुप्रसिद्ध फिल्मकार कासीनाधुनी विश्वनाथ को सम्मानित किया गया। के. विश्वनाथ के रूप में प्रसिद्ध यह फिल्मकार अब तक 50 से अधिक तेलुगू और हिंदी फिल्मों का निर्देशन चुके हैं। इनकी प्रमुख फिल्मों में ‘संकराभरणम’, ‘स्वाति मुत्यम’, ‘सप्त्सदी’, ‘सागर संगमम’ के साथ हिंदी की ‘सरगम’, ‘ईश्वर’ , ‘कामचोर’, ‘संजोग’ और ‘धनवान’ शामिल हैं। अपने जीवन के 87वें वर्ष में पहुंच चुके विश्वनाथ को इससे पहले पांच बार राष्ट्रीय पुरस्कार मिल चुका है। साथ ही बहुत से नंदी अवार्ड और फिल्म फेयर पुरस्कार भी मिल चुके हैं। भारत सरकार 1992 में इन्हें पदमश्री से भी सम्मानित कर चुकी है। के. विश्वनाथ फाल्के पुरस्कार पाने वाले 48वें व्यक्ति हैं।

इनके अतिरिक्त इस वर्ष जिन फिल्म हस्तियों को राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार से सम्मानित किया जा रहा है उनमें सर्वोत्तम अभिनेता का पुरस्कार अक्षय कुमार को फिल्म ‘रुस्तम’ के लिए मिला है जबकि सर्वोत्तम अभिनेत्री का पुरस्कार सुरभि सीएम को, मलयालम फिल्म ‘मिननामिनुंगु- द फायर फ्लाई’ के लिए मिला है। उधर, ‘नीरजा’ फ़िल्म के लिए सोनम कपूर को विशेष उल्लेख पुरस्कार के लिए चुना गया है और सर्वोतम निर्देशन का  पुरस्कार मराठी फिल्म ‘वेंटिलेटर’ के लिए राजेश मापुस्कर को मिला है। इनके अतिरिक्त सर्वोत्तम फीचर फिल्म का पुरस्कार मराठी फिल्म ‘कासव’ को और सामाजिक मुद्दों को उठाने वाली फिल्म का ‘पिंक’, बाल फिल्म का ‘धनक’ और सर्वोत्तम हिंदी फिल्म का पुरस्कार ‘नीरजा’ को प्रदान किया जाएगा। विशेष प्रभाव के लिए ‘शिवाय’ फिल्म भी पुस्कृत की जा रही है।

देश स्वतंत्र होने के पश्चात कला, संस्कृति, सिनेमा और साहित्य आदि को प्रोत्साहित करने और श्रेष्ठ कार्य करने वालों को पुरस्कृत करने की आवश्यकता के अंतर्गत विभिन्न समितियों का गठन किया गया था। उन्हीं में सन् 1949 में एक फिल्म इंक्वारी कमेटी भी थी। इस कमेटी ने शिक्षा, संस्कृति के मूल्यों को लेकर बनी सर्वोत्तम फिल्मों को प्रति वर्ष राजकीय पुरस्कार से पुरस्कृत करने की सिफारिश कींजिससे उच्च तकनीक की अच्छी फिल्मों के निर्माण को प्रोत्साहन मिल सके। इन पुरस्कारों में सर्वोत्तम भारतीय फीचर फिल्म और सर्वोत्तम भारतीय गैर फीचर फिल्म के लिए राष्ट्रपति का स्वर्ण पदक और सर्वोत्तम भारतीय बाल फिल्म के लिए प्रधानमंत्री स्वर्ण पदक प्रदान करने का सुझाव दिया गया। साथ ही और कुछ अन्य फिल्मों और वृत्तचित्रों को योग्यता प्रमाणपत्र देने का निश्चय भी किया गया। सूचना प्रसारण मंत्रालय द्वारा इन सिफारिशों को साकार करने के लिए सन् 1953 में प्रदर्शित फिल्मों का मूल्यांकन करते हुए सन् 1954 में वर्ष 1953 की सर्वोत्तम फिल्मों के पुरस्कार दिए गए। दिलचस्प तथ्य यह है कि सन् 1954 में जहां कुल सात पुरस्कार प्रदान किए गए वहां अब इन पुरस्कारों पाने वाले व्यक्तियों की कुल संख्या 100 के आसपास तक हो जाती है। असल में समय के साथ-साथ इन पुरस्कारों में नई श्रेणियां जोड़ी जाती रहीं। इनमें सर्वोत्तम अभिनेता, अभिनेत्री के पुरस्कार भी जुड़े जो शुरू में नहीं थे। ऐसे ही गीत, संगीत, गायक, गायिका, पटकथा, छायांकन, संपादन, नृत्य संयोजन, वेशभूषा, रूप सज्जा आदि के साथ सर्वोत्तम फिल्म समीक्षक और सर्वोत्तम फिल्म पुस्तक तक के बहुत से पुरस्कार इस समारोह में वर्ष प्रति वर्ष जुड़ते चले गए। इससे पुरस्कारों की संख्या तो बेशक अधिक हो गई लेकिन फिल्म की लगभग सभी विधाएं इन पुरस्कारों में शामिल हो चुकी हैं। अब तो इन पुरस्कारों में उन राज्यों को भी पुरस्कृत करने का नया सिलसिला आरम्भ हो चुका है जिसमें उन राज्यों को ‘सर्वश्रेष्ठ फिल्म अनुकूल राज्य’ का पुरस्कार दिया जाएगा जो राज्य अपने यहां फिल्मों की शूटिंग आदि के लिए विशेष नीति, व्यवस्था और वातावरण तैयार कर रहे हैं। इस वर्ष गैर फीचर फिल्म में भी एक नया पुरस्कार ‘सर्वोत्तम ऑन-लोकेशन साउंड’ शामिल किया गया है।

इन राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों में लाइफ टाइम अचीवमेंट अवार्ड के रूप में जब दादा साहब फाल्के पुरस्कार भी शामिल कर लिया गया तो इन पुरस्कारों का महत्व और भी बढ़ गया। इससे इन पुरस्कारों में फिल्म संसार के वे वरिष्ठ व्यक्ति भी जुड़ गए जो चाहे वर्तमान में कोई बड़ा या अच्छा काम न भी कर रहे हों लेकिन उन्होंने पूर्व वर्षों में फिल्म जगत को अपना उल्लेखनीय योगदान दिया हो। भारत में फिल्मों के पितामह कहे जाने वाले धुंधीराज गोविन्द फाल्के का जब 1969 में जन्म शताब्दी वर्ष आया तब भारत सरकार ने उनकी स्मृति में उन्हें सम्मान देने के लिए सिनेमा के अत्यंत विशिष्ट साधकों को दादा साहब फाल्के सम्मान देने का निर्णय लिया। वर्ष 1969 के लिए पहला फाल्के सम्मान 1970 में अभिनेत्री देविका रानी को दिया गया। तब से अब तक 48 फिल्म हस्तियों को यह सम्मान दिया जा चुका है। हाल के बरसों में फाल्के सम्मान पाने वालों में मनोज कुमार, शशि कपूर, गुलज़ार और प्राण जैसे दिग्गज नाम शामिल हैं। यूं इससे पूर्व लता मंगेशकर, दिलीप कुमार, राज कपूर, सत्यजित राय, वी शांताराम, अशोक कुमार, दुर्गा खोटे, यश चोपड़ा, आशा भोंसले, बीआर चोपड़ा, नौशाद, कवि प्रदीप, शिवाजी गणेशन, एलवी प्रसाद, देव आनंद, मृणाल सेन, मजरुह सुल्तान पुरी और सोहराब मोदी जैसे और भी कई प्रतिष्ठित फिल्मकारों को इस पुरस्कार से नवाजा जा चुका है।

यहां यह भी बता दें कि आरम्भ में फाल्के पुरस्कार के लिए जहां 11 हज़ार रुपये की राशि सम्मान स्वरूप दी जाती थी वहीं अब फाल्के सम्मान की राशि बढ़कर 10 लाख रुपये हो गई है। इससे यह देश में फिल्म पुरस्कारों की सर्वाधिक राशि वाला सम्मान तो हो ही गया है, साथ ही फाल्के सम्मान पाना भी हर फिल्म हस्ती का सपना सा हो गया है।

(लेखक फिल्म समीक्षक हैं, और प्रतिष्ठित समाचार पत्रों व पत्रिकाओं में नियमित रूप से लिखते हैं।)

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