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ब्रिक्स देशों के बीच संयुक्त फिल्म निर्माण के सिलसिले को शुरू करेगा फिल्म समारोह

ब्रिक्स देशों के बीच संयुक्त फिल्म निर्माण के सिलसिले को शुरू करेगा ब्रिक्स फिल्म समारोह

दुनिया में यूं तो सालभर में बहुत से राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोह आयोजित होते रहते हैं लेकिन नई दिल्ली में आयोजित पहला ‘ब्रिक्स’ फिल्म समारोह एक ऐसी नई पहल है जिसने ब्रिक्स देशों के लिए कई नए रास्ते खोल दिए हैं।

ब्रिक्स राष्ट्र समूह के पांच देशों के इस फिल्म समारोह का गत 6 सितम्बर को समापन हुआ तो महसूस हुआ कि भविष्य में इस समारोह के माध्यम से सिनेमा, कला और संस्कृति के क्षेत्र में अनेक नए सम्बन्ध और कई नए आयाम स्थापित हो सकेंगे।

पिछले वर्ष रूस में आयोजित ब्रिक्स शिखर सम्मलेन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने यह विचार रखा था कि ब्रिक्स देशों में प्रति वर्ष एक फिल्म समारोह का आयोजन किया जाना चाहिए। एक ऐसा फिल्मोत्सव जिसमें पांचों देशों की फिल्मों के प्रदर्शन के साथ इन देशों की कला संस्कृति भी प्रस्तुत की जाए और इन पांचों देशों के विभिन्न व्यंजनों का स्वाद भी इस फिल्मोत्सव के दौरान लिया जा सके। समारोह में प्रदर्शित फिल्मों में से सर्वश्रेष्ठ फिल्मों को पुरस्कृत भी किया जाए। 

प्रधानमंत्री के इस प्रस्ताव पर सभी ब्रिक्स राष्ट्रों ने उसी समय अपनी स्वीकृति दे दी और पहला ब्रिक्स फिल्म समारोह नई दिल्ली में आयोजित करने का निर्णय लिया गया। उसी निर्णय और प्रस्ताव को साकार रूप देने के लिए गत 2-6 सितम्बर के दौरान दिल्ली के सिरीफोर्ट सभागार में प्रथम ब्रिक्स फिल्म समारोह का आयोजन हुआ।

पांच दिवसीय इस फिल्म समारोह में भारत, रूस, ब्राजील, चीन और दक्षिण अफ्रीका यानी ब्रिक्स के सभी पांच देशों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। समारोह के प्रतियोगिता वर्ग में कुल 20 फिल्मों का प्रदर्शन हुआ जिनमें पांचों देशों की चार चार फिल्में थीं। समारोह के दौरान इन देशों के कई फिल्म निर्माता, निर्देशक और कलाकार आदि ने भी शिरकत की और विभिन्न कलाकारों ने सांस्कृतिक कार्यक्रम भी प्रस्तुत किए। हालांकि विदेशी व्यंजनों की भागीदारी तो नाम मात्र रही, इसीलिए ब्रिक्स फूड स्टाल्स पर हमारे छोले-कुलचे, गोलगप्पे, पाव भाजी, मसाला डोसा, इडली और बड़ा सांभर ही छाए रहे,  लेकिन इन देशों की शिल्प कला को सभी ने सराहा।

इस पहले ब्रिक्स फिल्म समारोह में भारत की कन्नड़ फिल्म ‘तिथि’ को सर्वश्रेष्ठ फिल्म का पुरस्कार मिला। इसी वर्ष 63 वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार में सर्वोत्तम कन्नड़ फिल्म सहित कुछ अन्य पुरस्कारों से पहले से पुरस्कृत हो चुकी ‘तिथि’ फिल्म का निर्माण प्रताप रेड्डी और निर्देशन राम रेड्डी ने किया। हालांकि प्रतियोगिता में भारत की तीन और फिल्में- बाहुबली, फिल्मवाला और बाजीराव मस्तानी भी थीं, लेकिन बाजी मारी ‘तिथि’ ने। समारोह में दक्षिण अफ्रीका की फिल्म ‘कलुशी’ के थाबो रामेत्सी को सर्वोत्तम अभिनेता और रूस की फिल्म ‘द बैटल फॉर सेवासतोपोल’ की युलिया पेरेसिल्ड को सर्वोत्तम अभिनेत्री का पुरस्कार प्रदान किया गया। सर्वोत्तम निर्देशक का ब्रिक्स पुरस्कार चीन की फिल्म ‘शुआन झंग’ के निर्देशक जियांकी हुओ को मिला। इनके अलावा चीन की फिल्म ‘सांग्स ऑफ द फीनिक्स’ को विशेष उल्लेख और ब्राजील की ‘बिटवीन वैली’ को निर्णायक मंडल का विशेष पुरस्कार प्रदान किया गया। समारोह में कुल छह पुरस्कार प्रदान किए गए।

पांच देशों के इस प्रथम फिल्म समारोह में ही जो वातावरण देखने को मिला वह अद्धभुत था। असल में इससे पहले कभी किसी राष्ट्र समूह संस्था द्वारा इस प्रकार के नियमित फिल्म समारोह का आयोजन नहीं हुआ। यूरोपियन यूनियन फिल्मोत्सव या एशियाई आदि देशों के जो फिल्म समारोह होते हैं वे भी ब्रिक्स फिल्मोत्सव से बिल्कुल भिन्न हैं। फिर जो अन्तरराष्ट्रीय फिल्म समारोह दुनियाभर में आयोजित होते हैं उनमें फिल्म निर्माण में जुटे लगभग सभी देश हिस्सा लेते हैं। उन्हीं समारोह में कभी किसी एक देश या कभी एशिया, अफ्रीका, यूरोपीय या लेटिन अमेरिकी देशों पर फोकस कर विशेष खंड का आयोजन तो किया जाता है, लेकिन पूरे विश्व में कहीं भी कोई ऐसा फिल्म समारोह नहीं है, जहां किसी विशेष राष्ट्र समूह की फिल्मों के साथ वहां की कला, संस्कृति यहां तक कि वहां के व्यंजनों को भी देखा, परखा जा सके।

यह सब देख कर कहा जा सकता है कि ‘ब्रिक्स फिल्म समारोह’ ने व्यापक संभावनाओं के द्वार खोल दिए हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि ब्रिक्स के इन पांच देशों में ही विश्व की 43 प्रतिशत जनसंख्या बसती है। इससे इस एक मंच पर इन पांच देशों को अपनी फिल्मों, कला और संस्कृति का परस्पर आदान प्रदान करने के अवसर के साथ ही फिल्मों, कला और खानपान के लिए एक विशाल बाजार भी मिल सकता है।

समारोह के दौरान इन देशों से आए प्रतिनिधि जहां एक ओर हमारी फिल्में देखने को आतुर थे तो दूसरी ओर हमारे गोलगप्पे और छोले-कुलचे भी उन्हें बेहद पसंद आ रहे थे। उधर समारोह के उद्घाटन के दौरान ब्राजील, रूस, चीन और दक्षिण अफ्रीका के सांस्कृतिक कार्यक्रमों को देख सभी मंत्रमुग्ध हो गए। रूस के लेनिनग्राद सेंटर थिएटर के कलाकारों ने उद्घाटन के दौरान तो समां बांधा ही, लेकिन समारोह के दूसरे दिन शाम को भी जब इन रूसी कलाकारों ने अपनी सांस्कृतिक कला का प्रदर्शन किया तो उपस्थित जनसमूह दांतों तले उंगली दबाने को मजबूर हो गया। ये कार्यक्रम कितना दिलकश रहा होगा इसका प्रमाण इस बात से भी मिलता है कि करीब डेढ़ घंटे तक चले इस समारोह में खचाखच भरे सभागार के गलियारे में भी लोग जमीन पर बिना हिले बैठे रहे। समापन समारोह के समय भी चीन के सांस्कृतिक कार्यक्रम कमाल के थे।

फिल्म समारोह में भारतीय फिल्मों के प्रति दर्शकों की दीवानगी भी देखते ही बनती थी। प्रतियोगिता खंड में सम्मिलित भारतीय फिल्मों में से जब ‘बाहुबली’ और ‘बाजीराव मस्तानी’ का प्रदर्शन हुआ तो थोड़े ही समय में थिएटर खचाखच भर गए, लेकिन दर्शकों ने इस बात की परवाह किए बिना गलियारे में फर्श पर बैठने में भी संकोच नहीं किया और जिन्‍हें कहीं भी जगह नहीं मिली वे दर्शक बिना फिल्म देखे मायूस हो लौटने को विवश हो गए। सर्वोत्तम फिल्म का पुरस्कार पाने वाली कन्नड़ फिल्म ‘तिथि’ के प्रदर्शन के समय भी हाउसफुल रहा।

उधर, ब्रिक्स फिल्म समारोह के उद्घाटन के समय दिखाई गई निर्देशक जयराज की मलयालम फिल्म ‘विराम’, सुप्रसिद्ध अभिनेता जैकी चैन और निर्देशक रेंनी हर्लिन की समापन फिल्म ‘स्किपट्रेस’ को देखने के लिए भी दर्शकों में जबरदस्त उत्साह था।

इस समारोह के दौरान एक और बात पर बल दिया गया कि संयुक्त फिल्म निर्माण को लेकर दो देशों के संयुक्त तत्वाधान में बनी फिल्मों को प्रत्यक्ष रूप से दो देशों का बाजार तो मिलता ही है, साथ ही दो देशों के बीच तकनीकी जानकारी भी साझा होती है। इसके अतिरिक्त दो देशों की संस्कृति का आदान-प्रदान तथा पर्यटन विकास में सहयोग भी मिलता है। उल्लेखनीय है कि भारत ने हाल ही में ब्रिक्स समूह के दो देश ब्राजील और चीन के साथ संयुक्त फिल्म निर्माण के सम्बन्ध में समझौतों पर हस्ताक्षर किए हैं। यहां यह भी दिलचस्प है कि इस प्रथम फिल्मोत्सव में प्रदर्शित चीन की एक फिल्म ‘शुआन झंग’ में चीन के साथ राम गोपाल बजाज और सोनू सूद जैसे भारतीय कलाकारों ने भी अभिनय किया है।

इस ब्रिक्स फिल्मोत्सव की एक विशेषता यह भी रही कि समारोह में प्रतियोगी फिल्मों के अतिरिक्त रूस और भारत के फिल्म विद्यार्थियों की 17 लघु फिल्में भी दिखाई गई। इसके अलावा प्रतियोगिता वर्ग से अलग एक रूसी फिल्म ‘लियो टॉलस्टॉय एंड महात्मा गांधी’ भी समारोह में चर्चा का विषय बनी रही। लियो टॉलस्टॉय और महात्मा गांधी जीवन में कभी मिले तो नहीं लेकिन यह फिल्म इन दोनों महान विभूतियों के बीच हुए पत्र व्यवहार को लेकर है।

असल में ब्रिक्स फिल्म समारोह, देश-विदेश में विभिन्न स्थानों पर होने वाले अन्य अन्तरराष्ट्रीय फिल्म समारोहों से इसलिए भी अलग है क्‍योंकि अन्तर्राष्ट्रीय फिल्म समारोह में इतने अधिक देश होते हैं कि परस्पर संवाद और एक दूसरे को समझने के अवसर और समय दोनों का अभाव रहता है। लेकिन पांच देशों के सीमित समारोह में सभी एक दूसरे की फिल्म और कला को अच्छे से जान सकते हैं। समारोह में रूस की फिल्म ‘एबाउट लव’ की अभिनेत्री मारिया दैनिलयुक कहती हैं कि मुझे लगा था भारतीय दर्शक रूस की फिल्मों को पसंद नहीं करेंगे लेकिन फिल्म प्रदर्शन के समय जब उनका उत्साह देखा तो मैं दंग रह गई। ऐसे ही रूस की फिल्म ‘द बैटल फॉर सेवासतोपुल’’ के निर्देशक सरगेए मॉकरिटसकी ने कहा कि उन्होंने 14 साल की उम्र में ‘सीता और गीता’ देखी थी तभी से उन्‍हें भारतीय फिल्में देखने का शौक पैदा हो गया। चीन के जियानडोंग भी बताते हैं कि सन 1970-80में बनी भारतीय फिल्मों को चीन में आज भी बहुत पसंद किया जाता है।

इन बातों से यह पता चलता है कि आने वाले समय में ब्रिक्स देशों के बीच संयुक्त रूप से फिल्म निर्माण का सिलसिला भी जोर पकड़ सकता है और इन देशों के सांस्कृतिक कार्यक्रमों को भी साझा करने के लिए नए मंच मिल सकते हैं। हालांकि दिल्ली में हुए इस पहले ब्रिक्स फिल्मोत्सव के आयोजन के लिए अधिक समय नहीं मिला था, लेकिन अब इस फिल्म समारोह की रूपरेखा तैयार हो गई है और अगले साल जब दूसरा ब्रिक्स फिल्म समारोह चीन के चेंगडू शहर में होगा तब तक इसका स्वरूप और भी व्यापक होगा।

(लेखक पत्रकार हैं।)

Last modified onTuesday, 13 September 2016 12:48
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