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हिन्दी फिल्मों में दिखती रही है राष्ट्रवाद की झलक...

पिछले 70 वर्षों में हिन्दी की अनेक यादगार फिल्मों ने लोगों में देशभक्ति भाव, शौर्य और देश के लिए बलिदान का भाव भरा है। फिल्मों के विषय स्वतंत्रता संघर्ष, आक्रमण और युद्ध, खेल, प्राचीन और मध्यकालीन इतिहास, विद्रोह आदि रहे हैं। लेकिन, सबके मूल में भारतीय होना और देश के प्रति कर्तव्य का भाव रहा है।

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कोई मुकाबला आज भी नहीं है ‘दूरदर्शन’ का...

टेलीविजन का आविष्कार यूं तो जॉन एल बिलियर्ड ने 1920 के दौर में ही कर दिया था लेकिन भारत में यह टीवी तब पहुंचा जब 15 सितम्बर 1959 को तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने दिल्ली में एक प्रसारण सेवा दूरदर्शन का उद्घाटन किया। हालांकि तब शायद किसी ने नहीं सोचा होगा कि यह दूरदर्शन, यह टीवी आगे चलकर जन-जन की जिंदगी का अहम हिस्सा बन जाएगा। आज यह टीवी रोटी, कपड़ा और मकान के बाद लोगों की चौथी ऐसी जरूरत बन गया है जिसके बिना जिंदगी मुश्किल और सूनी सी लगती है।

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भारत में टेलीविजन क्रांति का सफर : दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा टीवी बाजार है भारत

ब्रिटिश ब्रॉडकास्टिंग कॉरपोरेशन (बीबीसी) द्वारा 1936 में दुनिया की पहली टेलीविजन सेवा शुरू करने के दो दशक के बाद ही भारत में 15 सितम्‍बर, 1959 को दिल्‍ली में टेलीविजन शुरू किया गया। यूनेस्‍को की सहायता से इसकी शुरुआत की गई। शुरुआत में हफ्ते में दो दिन एक-एक घंटे के लिए कार्यक्रमों का प्रसारण किया जाता था जिनमें सामुदायिक स्‍वास्‍थ्‍य, यातायात, सड़क के इस्‍तेमाल पर नागरिकों के अधिकार और कर्तव्‍य जैसे विषय शामिल थे।

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संवेदनशीलता के शिल्पकार हैं के. विश्‍वनाथ

संवेदनशीलता के शिल्पकार हैं के. विश्‍वनाथ

जाने-माने तेलुगू निर्देशक कासीनाधुनी विश्‍वनाथ को भारतीय सिनेमा में उनके विशिष्‍ट योगदान के लिए वर्ष 2016 के लिए प्रतिष्ठित दादासाहेब फाल्‍के पुरस्‍कार से सम्‍मानित किया गया है। (Read in English)

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