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उपभोक्ता को ‘किंग’ बनाने की कवायद

आलोक कुमारगुड्स एंड सर्विस टैक्सेज (जीएसटी) यानी “एक भारत-एक कर”। इसको एक नई आर्थिक क्रांति कहा जा रहा है। जीएसटी की व्यवस्था को स्थिर करने का काम जारी है। कहा जा रहा है कि इसके जरिए हम नवविकासवाद की ऊंचाईयों का स्पर्श करने जा रहे हैं। यह भी दावा किया जा रहा है कि कर वसूली की सुदृढ़ व्यवस्था करने का एक मकसद उपभोक्ता को “किंग” बनाना भी है। लेकिन, उपभोक्ता खुद को तब ही किंग यानी सहूलियत वाली अवस्था में महसूस करेगा जब सरकार उचित, सटीक और मानक मापतौल वाला सामान मिलने की व्यवस्था सुनिश्चित करेगी।

इसमें ठोस प्रावधान होंगे कि मिलावटखोर की खैर न मन पाए। ई-कॉमर्स के जरिए समान की डिलीवरी को लेकर धोखाधड़ी बंद हो जाए। एक उत्पाद का हर जगह एक ही एमआरपी यानी मैक्सिमम रिटेल प्राइस हो। विज्ञापनों के जरिए उपभोक्ताओं को बेवकूफ बनाने वाले सहम जाएं।

किसी अर्थव्यवस्था के प्रभावी संचालन के लिए उपभोक्ता के संरक्षण का दायित्व सरकार पर है। विकसित यूरोपीय जगत और अमेरिका में उपभोक्ताओं के संरक्षण की कई किवदंतियां अक्सर सुनने को मिलती हैं। तब हठात अहसास होता है कि काश हमारे यहां भी उपभोक्ताओं के संरक्षण का विधान कठोर कानूनी पैबंद वाले होते। पूरा मामला सिर्फ “जागो ग्राहक जागो” के विज्ञापन तक सीमित होने के बजाय व्यवहारिक बन पाता। विकसित जगत के बाजार का असली मालिक उपभोक्ता ही हैं। अपने यहां भी ऐसी मजबूत व्यवस्था हर कोई चाहता है। इसके लिए हमारी व्यवस्था में बदलाव की दलील लंबे समय से दी जा रही थी।

तीन साल पहले एनडीए की सरकार आने के बाद उपभोक्ता संरक्षण के लिए किए प्रयास के नतीजे अब धरातल पर दिखने लगे हैं। बड़ी संख्या में झूठे और भ्रामक विज्ञापन आने की बात पकड़ में आते ही सरकार कुछ सक्रिय हुई है। भ्रामक विज्ञापनों से निपटने के लिए लंबे समय से सख्त नियम बनाने की बात तो होती रही है। पहली बार है कि सदी के महानायक अमिताभ बच्चन और क्रिकेट के भगवान सचिन तेंदुलकर तक को कमजोर उत्पाद का विज्ञापन करने के बुरे नतीजे झेलने पड़े हैं। कानूनी मेट्रोलॉजी (पैकेज वस्तुओं) नियम 2011 को प्रभावी करने का काम बल है। यह नया उपभोक्ता संरक्षण कानून की मजबूत पृष्ठभूमि तैयार करता है जिसके तहत भ्रामक विज्ञापन देने वालों को सख्त सजा का प्रावधान होगा।

कंपनी अपने उत्पाद की बिक्री बढ़ाने के लिए प्रचार करती है लेकिन विज्ञापन और उत्पाद के गुणवत्ता का तारतम्य बैठाना अक्सर मुश्किल होता है। विज्ञापनों को गुमराह करने वाला पाए जाने की बात आम है। इसे उपभोक्ता के विश्वास के प्रति धोखे का मामला मानने की कानूनी व्यस्था हो रही है। धोखेबाजों के लिए भारतीय दंड संहिता में जो प्रावधान हैं, उसमें उपभोक्ताओं को नुकसान पहुंचाने वाले विज्ञापनदाता और विज्ञापन करने वाले सिलेब्रेटी दोनों के खिलाफ कानून आयद किया जा रहा है। हमारे समाज में जागरूकता की व्यापक कमी के चलते ज्यादातर लोग वस्तुओं की उपयोगिता को विज्ञापनों में किए गए दावों के मुताबिक मान लेते हैं और उसकी हकीकत के बारे में पड़ताल नहीं करते जबकि किसी भी उपभोक्ता को यह अधिकार होना चाहिए कि वह उत्पाद के विज्ञापन में दावा किए गए गुणवता के जांच की मांग करे। ऐसा नहीं पाए जाने पर उसके खिलाफ शिकायत का अधिकार रखे।

वस्तुओं के विज्ञापन में किए गए दावों की वास्तविकता की जांच परख की कोई कसौटी नहीं थी और न इन पर कारगर तरीके से रोक लगाने के लिए कोई तंत्र था। अब सरकार ने इस तंत्र को सक्रिय करने का फैसला लिया है। नए दिशा-निर्देश में किसी वस्तु के गुण-दोषों का ब्योरा न देकर भ्रमित करने वाली जानकारियां देते अखबार, टीवी या एसएमएस के जरिए परोसे जाने वाले विज्ञापनों पर रोक लगाने का प्रावधान है।

उपभोक्ता संरक्षण कानून अधिनियम 1986 देशभर में लागू है। तब से इसके जरिए कानून लागू करने वाली एजेंसियों को उपभोक्ताओं के संरक्षण में खड़े होने का हक मिला हुआ है। इसमें उपभोक्ता के अधिकार तौर पर उल्लेखित है कि उपभोक्ता जीवन एवं संपत्ति के लिए घातक पदार्थों या सेवाओं की बिक्री से बचाव का अधिकार रखेगा। उपभोक्ता पदार्थों एवं सेवाओं का मूल्य, उनका स्तर, गुणवत्ता, शुद्धता, मात्रा व प्रभाव के संबंध में सूचना पाने का अधिकार है। जहां भी संभव हो, प्रतिस्पर्धात्मक मूल्यों पर उपभोक्ता पदार्थों एवं सेवाओं की उपलब्धि के भरोसे का अधिकार है। अपने पक्ष की सुनवाई का अधिकार के साथ सभी उपयुक्त मंचों पर उपभोक्त हितों को ध्यान में रखे जाने का आश्वासन मिला हुआ है। अनुचति व्यापार प्रक्रिया अथवा अनियंत्रित उपभोक्ता शोषण से संबंधित शिकायत की सुनवाई का अधिकार है। इसके लिए उपभोक्ता शिक्षा का अधिकार है।

उपभोक्ता संरक्षण कानून ज्यादातर उपभोक्ता वस्तुओं और सेवाओं पर लागू होता है। निजी, सरकारी और सहकारी सभी क्षेत्र के उत्पादों को इस कानून के अंतर्गत रखा गया हैं। जब किसी उपभोक्ता को लगे कि वस्तु या सेवा में कोई अनुचित या खराब है, जिसके कारण उसे हानि पहुंचती है। तब वह इस कानून का प्रयोग कर उचित उपभोक्ता फोरम में अपनी शिकायत दर्ज करा सकता है।

सरकार का दायित्व है कि वह उपभोक्ता में भरोसा पैदा करे कि वह घटिया माल के खिलाफ उपभोक्ता अदालत की शरण में जाए। शिकायत कर पाए। कानूनी प्रावधान है कि उपभोक्ताओं की पंजीकृत स्वयंसेवी संस्थाएं शिकायत कर सकती हैं। केंद्र सरकार शिकायत कर सकती है। राज्य सरकार शिकायत कर सकती है। समान हित वाले उपभोक्ता-समूह की ओर से एक अथवा अनेक उपभोक्ता शिकायत कर सकते हैं। नए नियम का प्रचार प्रसार जारी है। नतीजे क्रमबद्ध तरीके से सामने आने लगे हैं। एयरपोर्ट,सिनेमा हॉल, आम बाजार और मॉल्स में बेचे जाने वाले एक ही सामान पर अलग अलग एमआरपी का रैपर लगा होता था। अब तस्दीक की जा रही है कि एक सामान का एक ही एमआरपी हो। उपभोक्ताओं के लिए सामानों का ई-कोडिंग अनिवार्य किया जा रहा है ताकि मात्रा के चेकिंग को सांइटिफिट हो। इसी तरह सामान के सम्मिश्रण को रैपर पर बड़े अक्षरों में साफ-साफ अंकित करने के नियम को कठोरता से लागू करने की बात हो रही है।

सबसे ज्यादा मुश्किल जीवन रक्षक मेडिकल व्यवस्था से जुड़े उत्पादों पर होता रहा है। ज्यादा कीमत वसूलने के लिए कई नुस्खे विकसित कर लिए गए थे। उनसबकी पहचान कर मंत्रालय ने नियम के जरिए उपभोक्ताओं की सहूलियत का खयाल किया है। इसका असर बाजार पर दिखने लगा है। स्टैंट, सिरिंज, वॉल्व आदि की कीमतें कम हुई हैं। कम कीमत वाली दवाओं की उपलब्धता को आम किया जा रहा है। नए नियम के लागू होने से उपभोक्ताओं को पूरी तरह से उपभोक्ता अदालत के भरोसे छोड़ने के बजाए सरकार ने अपने हाथ में लेने की पहल की है। यह पहली बार दिख रहा है कि मौजूदा शासन व्यवस्था में अदालत में जाकर क्लेम कर राहत पाने वाले चुनिंदा लोगों पर फोकस करने की प्रवृति का परित्याग किया गया है। केंद्र सरकार ने आम उपभोक्ताओं को राहत पहुचने का काम खुद के हाथ में लेकर कानून प्रभावी करने वाली एजेंसियों को सक्रिय करने की ठान ली है।

(लेखक पत्रकार हैं)

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