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मानवाधिकारों को सुरक्षित रखने में सक्षम नहीं है पुलिस Featured

‘क्या पुलिस मानवाधिकारों को संरक्षित रखने में सक्षम है…?’ विषय पर आयोजित गोष्ठी में वक्ताओं ने कहा कि वक़्त की जरूरत है कि समूचे पुलिस तंत्र का आधुनिकीकरण और मानवीयकरण हो तथा व्यवस्था को राजनैतिक हस्तक्षेप व जातिगत प्रभावों से स्वतंत्र किया जाए।आगरा : ‘क्या पुलिस मानवाधिकारों को संरक्षित रखने में सक्षम है…?’ विषय पर आयोजित गोष्ठी में वक्ताओं ने कहा कि वक़्त की जरूरत है कि समूचे पुलिस तंत्र का आधुनिकीकरण और मानवीयकरण हो तथा व्यवस्था को राजनैतिक हस्तक्षेप व जातिगत प्रभावों से स्वतंत्र किया जाए।

विषय प्रवर्तन करते हुए वरिष्ठ पत्रकार ब्रज खंडेलवाल ने कहा 1861 में बने पुलिस कानून को बदल कर नए प्रावधान जोड़े जाएं। सोली सोराबजी समिति, रुस्तम जी कमिटी और नेशनल पुलिस कमीशन की रिपोर्ट्स में दी गई सिफारिशों पर आज तक अमल नहीं हो सका है। ट्रांसफर पोस्टिंग के जरिये नेता पुलिस के माध्यम से फलफूल रहे हैं। आम लोगों का पुलिस के बारे में अच्छी सोच नहीं है। दोस्त की जगह पुलिसवालों को सामाजिक खतरा माने जाने लगा है। मानवाधिकारों का सबसे बड़ा शत्रु पुलिसतंत्र ही है। हिरासत में मौत, फ़र्ज़ी एनकाउंटर्स से पुलिस की साख गिरी है।

गोष्ठी में रखे प्रस्ताव में मांग की गई कि राष्ट्रीय पुलिस कमीशन की सिफारिशों पर पूरे तरीके से अमल किया जाए व पूर्व महानिदेशक (उत्तर प्रदेश) प्रकाश सिंह द्वारा सितम्बर 2006 में दायर याचिका पर सर्वोच्च न्यायालय तुरंत फैसला करे।

अध्यक्षता कर रहे शिक्षाविद शीलेन्द्र कुमार शर्मा ने कहा कि जांच और निगरानी के तरीके बदले जाएं। पुलिस का मानवीय चेहरा सामने आना चाहिए। पुलिसवालों की चाल, चेहरा और चरित्र वक़्त रहते बदल जाए तो समाज के लिए अच्छा रहेगा।

गोष्ठी में हुतेंद्र पाल सिंह, देवेंद्र कुमार गौतम, प्रशांत पचौरी, रजनीश वर्मा, पूनम पांडेय, सामाजिक कार्यकर्ता लक्ष्मी नारायण, जगन प्रसाद आदि ने भाग लिया।

Last modified onSunday, 11 December 2016 21:13
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