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60 साल में कितनी बदली संसद? Featured

आगरा: संसद की पहली बैठक को 60 साल हो गए हैं। इस अवसर पर रविवार को दोनों सदनों में विशेष बैठकों का आयोजन किया गया। संसद के 60 वर्ष पूरे होने पर कुछ सवाल भी उठ रहे हैं, जिनमें से एक यह है कि क्या भारतीय संसद लोकतांत्रिक मूल्यों को बढ़ावा देने में सक्षम हुई है या यह प्रयोग विफल हो गया?

राजनीतिक मामलों के जानकार पारस नाथ चौधरी ने आगराटुडे.इन से कहा, "पंचायत और नगर निगमों से लेकर विधानसभा और संसद के दोनों सदनों में केवल भड़काऊ भीड़ दिखती है। अब वैसी प्रबुद्ध बहस सुनने को नहीं मिलती, जैसी 1977 में जनता पार्टी के दौरान तक थी।"

लखनऊ से पूर्व समाजवादी नेता राम किशोर ने कहा, "राज नारायण, मधु लिमये या पिलू मोदी जैसे नेताओं ने संसद को जीवंत लोकतांत्रिक संस्था बनाए रखा था। सरकार को अपने प्रश्नों से असहज कर देने वाले नेताओं में एचवी कामत, सुब्रह्मण्यम स्वामी, एसएन मिश्रा, शिब्बन लाल सक्सेना और कुंवरलाल गुप्ता के नाम भी शामिल हैं। 1970 के दशक तक सक्रिय ये नेता सरकार की एक-एक चूक पर नजर रखते थे। मंत्री बिना पूरी तैयारी के संसद नहीं आते थे।"

चंद्रशेखर सरकार में उप मंत्री रह चुके राम जी लाल सुमन ने कहा, "वर्ष 1977 में कई बड़े कद के नेता थे। आज की संसद वैसी मालूम नहीं पड़ती। आज के नेताओं में विचारधाराओं के प्रति प्रतिबद्धता का भी अभाव दिखता है, खासकर युवा सांसदों में। वे मुश्किल से पुस्तकालय जाते और अपना भाषण तैयार करते हैं।"

वहीं, सामाजिक कार्यकर्ता श्रवण कुमार ने कहा, "यदि हमारे पास संसद है तो ऐसे सांसद भी होने चाहिए, जो न केवल घोटालों को उजागर करें, बल्कि निर्णय निर्माण में भी सहयोग दें और संसद की कार्यवाही भी सुचारु चलने दें।"

कांग्रेस के पूर्व विधायक सतीश चंद्र गुप्ता के अनुसार, "संसदीय संस्थाओं के कामकाज को देखकर मुझे कोई खुशी नहीं होती। राजनीतिज्ञों का बौद्धिक स्तर समाप्त हो गया है।"

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