Menu

 

English Edition

मलिन बस्तियों के बच्चों को सपनों की उड़ान दे रहा है 'बस्ती का रंगमंच'

नाट्य संस्था 'रंगलीला' ने रंगकर्म की एक नई अवधारणा से इन बस्तियों के बच्चों को जोड़ा है और अपने इस नए अभियान का नाम रखा है 'बस्ती का रंगमंच।'

आगरा : घटिया आज़म खां क्षेत्र से जुड़ी आधा दर्जन से ज़्यादा मलिन बस्तियों में इन दिनों सांस्कृतिक विकास की एक नई धारा बह रही है। नाट्य संस्था 'रंगलीला' ने रंगकर्म की एक नई अवधारणा से इन बस्तियों के बच्चों को जोड़ा है और अपने इस नए अभियान का नाम रखा है 'बस्ती का रंगमंच।' 

नाटक, नृत्य और गायन से अनिभिज्ञ 50 से ज़्यादा बच्चे और किशोर हर दिन साढ़े तीन घन्टे चलने वाली वर्कशॉप में आकर इस अनोखी रंग-बिरंगी दुनिया में डूबते-उतराते हैं जो अभी तक उनके लिए मात्र एक स्वप्न ही था और जिसे वे 'बड़े-बड़े स्कूलों' में पढ़ने वाले अभिजात्य बच्चों की मिलकियत ही समझते थे। 

'रंगलीला' आगरा और ब्रज क्षेत्र की मृतप्राय: होती जा रही लोक कलाओं के पुनरुद्धार के लिए पिछले 11 वर्ष से जानी जाती है। 50 साल पहले लुप्त हो चुकी लोक नाट्य कला 'भगत' के पुनरुद्धार की उसकी कोशिशों ने उसे 'संगीत नाटक अकादमी' के मानचित्र में भी अंकित कर दिया है।

"मैंने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि मैं एक्टिंग भी कर सकती हूं। बचपन में जब कभी मैं किसी की नक़ल उतारती तो मुझे घर में डांट पड़ती। पहली बार यहां आकर ऐसा करने पर न सिर्फ मेरी पीठ ठोंकी गई बल्कि मुझे एक्टिंग के लिए चुना गया। दो हफ्ते मैंने आवाज और शरीर की बहुत सारी एक्सरसाइज सीखीं। अब मैं 'सात सहेलियां' नाटक में काम कर रही हूं..." यह कहना है दलित परिवार में जन्मी 14 साल की सोनिया का। 15 साल का कमल माहौर उस दिन भौचक्का रह गया जब उसे यह बताया गया कि उसे डांस के लिए तैयार किया जाएगा। "यह सही है कि गाने सुनकर मेरे पांव थिरकने लगते थे, लेकिन डान्स! मैं तो यही मानता था कि यह सिर्फ लड़कियों के लिए है और अब मैं खुद लोक नृत्य सीख रहा हूं।" कहते-कहते उसके चेहरे पर मुस्कराहट उभर आती है।

'रंगलीला' के निर्देशक और 'बस्ती का रंगमंच' के परिकल्पनाकार अनिल शुक्ल बताते हैं, "मलिन बस्तियों में इस तरह के बच्चों के बीच काम करने का हमारा यह पहला अनुभव है। इस वर्कशॉप की ट्रेनिंग के लिए हमने जिस नए टूल को विकसित किया, वह है कहानी कहने की कला। भारतीय समाज की यह परंपरागत कला कभी प्रशिक्षण का एक बड़ा सामाजिक औज़ार हुआ करती थी लेकिन हाल के 4-5 दशकों में जिसका लोप हो गया है। हमने इसी औज़ार को दोबारा अपनाकर देखा और इसके अद्भुत परिणाम दिख रहे हैं। न सिर्फ एक्टिंग बल्कि नृत्य और गायन-विधाओं में भी हमारे ट्रेनर अपनी बात के सपोर्ट और उसके पक्ष का परिवेश खड़ा करने के लिए इसी कला का इस्तेमाल कर रहे हैं।” 

'बस्ती का रंगमंच' की वर्कशॉप ट्रेनर और 'रंगलीला' की वरिष्ठ अभिनेत्री सोनम वर्मा बताती हैं, "हम एक तरफ इन्हें कलात्मक प्रशिक्षण दे रहे हैं तो दूसरी तरफ शिक्षा की ज़रूरत से लेकर हाइजीन के प्रति चेतना भी हमारे एजेंडे में हैं। आप यहां किसी बच्चे को गन्दा नहीं देखेंगे, शुरू में ये स्थिति नहीं थी।" वर्कशॉप उनके बीच मनोरंजन के गहरे बीज तो बो ही रही है, वह दूसरे किस्म के बड़े बदलाव भी पैदा कर रही है। एक और ट्रेनर काजल गुप्ता बताती हैं, "शिखा का कई सालों से स्कूल जाना बंद था। उसकी चाची आई थीं, वह बता रही थीं कि अब वह स्कूल में दाखिला करवाने की ज़िद करने लगी है।" वर्कशॉप के ज़्यादातर बच्चे यूं तो स्कूल में रजिस्टर्ड हैं लेकिन उनमें स्कूल से मुंह चुराने वालों की भी अच्छी खासी तादाद है। यहां आकर उनमें से अनेक स्कूल की ज़रूरत महसूस करने लगे हैं। बहुत से मां-बाप बताते हैं कि स्कूल भले ही जाएं या न जाएं लेकिन एक्टिंग स्कूल में आने की तैयारी वह दोपहर से ही शुरू कर देते हैं। 

रीतिका यादव वर्कशॉप के बच्चों का नियमित रूप से इंटरव्यू कर रही हैं। रंगलीला' की और से वह इनमें आने वाले बदलावों का एक डाटा बैंक तैयार कर रही हैं। वह बताती है कि "दब्बू से दिखने वाले तमाम लड़के-लड़कियां शुरू में मुझसे बात करने से कतराते थे। अब वे धड़ल्ले से मिलते हैं और बड़े गर्व से बताते हैं कि अब उन्हें पापा के सामने बोलने में जरा भी डर नहीं लगता या कहते हैं कि स्पीच एक्सरसाइज करके उन्हें क्लास में भी जोर-जोर से किताब का पाठ करना आ गया है। 

एक्टिंग के ट्रेनर रंजीत गुप्ता कहते हैं, "उठना-बैठना, यहां तक कि खड़े होना,  वे अब नए तरीके से और भरपूर आत्मविश्वास से करने लगे हैं।" 

आगरा के विधवा आश्रम परिसर में चलने वाली इस वर्कशॉप में एक ओर जहां 'रंगलीला' के प्रशिक्षित ट्रेनर कार्यरत हैं, वहीं दूसरी ओर आश्रम की संवासिनी 'अम्माओं' को भी 'रंगलीला ने अपनी ट्रेनिंग टीम में शामिल कर लिया है। वे उन्हें दादी-नानी की रोचक कहानियां सुनातीं हैं तो दूसरी तरफ लोक नाच-गाना दिखाकर उन्हें नए सांस्कृतिक मूल्यों के रचना संसार में दाखिल करवा रही हैं। 

'आश्रम' के सचिव डॉ. राजीव फिलिप कहते हैं "आज के समाज में बच्चे और बूढ़े, यही दोनों सबसे ज्यादा उपेक्षित हैं। रंगलीला काफी दिनों से हमारे परिसर में अपनी 'भगत' और नाटकों की रिहर्सल करती थी। आश्रम की अम्माओं के लिए इन रिहर्सलों को देखना मुफ्त के मनोरंजन जैसा था। वे घंटों-घंटों इसे देखा करती थीं। अब तो वे उनके आमंत्रण पर उनके शो देखने भी जाने लगी हैं। 'बस्ती के रंगमंच' पर जब रंगलीला के लोगों ने कहा कि वे पहली वर्कशॉप में ट्रेनर के रूप में अम्माओं को भी शामिल करना चाहते हैं और इसलिए वे इसमें 'आश्रम' को भी अपना पार्टनर बनाना चाहते हैं तो हमारे लिए इससे ज्यादा ख़ुशी की बात और क्या होती।"  

'बस्ती का रंगमंच' के तहत 'रंगलीला' आगरा की अलग-अलग बस्तियों में साल में कम से कम चार वर्कशॉप करना चाहती है। उनके पास इस काम के लिए पैसे का गहरा संकट है। अनिल शुक्ल का कहना है कि कुछ मित्रों की आंशिक मदद और जोशभरे इरादों के साथ हमने यह काम शुरू किया है। जल्द ही हम तमाम सामाजिक मंचों से 'पब्लिक फंड' की अपील करने वाले हैं। यह पूछने पर कि उनका यह अभियान मूलतः सामाजिक बदलाव के लिए है या सांस्कृतिक चेतना की बाबत तो वह कहते हैं ''रंगलीला बस्ती का रंगमंच दरअसल लोक रंगकर्म की हमारी चित-परिचित अवधारणा का ही विस्तार है। नाटक, संगीत और नृत्य को हम वहां ले जाने की कोशिश कर रहे हैं जहां से यह लुप्त हो गया है। हम न सिर्फ उनके बीच मनोरंजन की एक नई बयार लेकर पहुंच रहे हैं बल्कि हमारे इरादे यहां से कलाकारों की ऐसी नई खेप पैदा करने के हैं जो आज अपराध, हिंसा और नशे के संसार में ग़ाफ़िल होने को अभिशप्त हैं।"

 

Last modified onFriday, 28 April 2017 13:39
back to top

loading...
Bookmaker with best odds http://wbetting.co.uk review site.